लेखक : अबू शहमा अंसारी
सआदतगंज, बाराबंकी
मोहम्मद सलमान जिला सहायक ब्यूरो प्रमुख बाराबंकी (एम डी न्यूज)
बाराबंकी। क़स्बा सआदतगंज की सरज़मीन हमेशा से इल्म-ओ-अदब, शेर-ओ-सुख़न और उर्दू ज़बान से मोहब्बत करने वालों के लिए ज़रख़ेज़ रही है। इस सरज़मीन ने वक़्त-वक़्त पर ऐसे अदबा, शोअरा, अहल-ए-क़लम और उर्दू के शैदाइयों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी सलाहियतों, मेहनत और ख़ुलूस से ज़बान-ओ-अदब की ख़िदमत की है। यहाँ उर्दू से मोहब्बत महज़ इज़हार-ए-ख़याल तक महदूद नहीं रही, बल्कि इसकी तरवीज-ओ-इशाअत के लिए अमली तौर पर काम करने वाले अफ़राद भी मौजूद रहे हैं। इन्हीं मुख़्लिस और ख़ामोश ख़िदमतगुज़ारों में इरशाद अंसारी साहब का नाम भी क़ाबिल-ए-ज़िक्र और लाइक़-ए-एहतराम है, जिन्होंने अपनी फ़न्नी महारत, अदबी ज़ौक़ और बे-लौस जज़्बा-ए-ख़िदमत से उर्दू ज़बान-ओ-सहाफ़त के लिए क़ाबिल-ए-क़द्र किरदार अदा किया है।

ज़िंदगी में कुछ शख़्सियात ऐसी होती हैं, जिनका एहसान वक़्त गुज़रने के साथ कम होने के बजाय और गहरा होता चला जाता है। उनकी दी हुई तालीम, शफ़क़त और उनके साथ गुज़ारे हुए चंद लम्हे इंसान की ज़िंदगी का क़ीमती सरमाया बन जाते हैं। उस्ताद का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। वह महज़ किताबों का इल्म नहीं देता, बल्कि अपने शागिर्द के लिए तरक़्क़ी और कामयाबी की राहें हमवार करता है। मेरे लिए इरशाद अंसारी साहब भी ऐसी ही क़ाबिल-ए-एहतराम शख़्सियत हैं, जिन्होंने मुझे कंप्यूटर की इब्तिदाई तालीम देकर एक ऐसा हुनर सिखाया, जिसकी बदौलत आज मैं अपना अख़बार “सदा-ए-बिस्मिल” आप के सामने पेश करने के क़ाबिल हूँ। मेरे दिल में उनके लिए जो इज़्ज़त, मोहब्बत और अकीदत है, उसे चंद सतरों में समेटना आसान नहीं। ताहम, आज माज़ी के उन ख़ुशगवार दिनों को याद करते हुए मैं उनकी ख़िदमात और एहसानात का एतिराफ़ करना अपना अख़लाक़ी फ़र्ज़ समझता हूँ।
यह उस ज़माने की बात है, जब कंप्यूटर आम लोगों की दस्तरस में नहीं था। सरकारी दफ़ातिर और चंद मख़्सूस इदारों के अलावा बहुत कम जगहों पर कंप्यूटर दिखाई देते थे। आज की तरह हर हाथ में मोबाइल और हर घर में कंप्यूटर होने का तसव्वुर भी आम नहीं था। उस वक़्त सफ़ेद रंग के मॉनिटर वाला कंप्यूटर एक नई और दिलचस्प दुनिया की अलामत था। मुझे याद है कि मैं सुबह सात बजे इरशाद अंसारी साहब के वालिद-ए-मोहतरम, सेठ मुश्ताक़ अहमद अंसारी साहब मरहूम, के साथ उनकी दुकान पर जाया करता था। मुश्ताक़ साहब और हमारे दादा मुहम्मद शफ़ी अंसारी साहब के दरमियान दोस्ताना ताल्लुक़ था। नमाज़-ए-फ़ज्र अदा करने के बाद दादा के पास बैठना, कुछ गुफ़्तगू करना और दूसरे अहबाब के साथ वक़्त गुज़ारना मुश्ताक़ साहब का रोज़ाना का मामूल था। इस नशिस्त में कई अहबाब भी मौजूद रहते थे। मैं भी अक्सर सुबह अपने दादा के साथ बैठा करता था और बुज़ुर्गों की गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ होता था। उनकी बातों और तजुर्बात से मुझे ज़िंदगी गुज़ारने के सलीक़े सीखने का मौक़ा मिला। आज जब माज़ी की तरफ़ पलटकर देखता हूँ, तो एहसास होता है कि उन बुज़ुर्गों की सोहबत ने ज़िंदगी को समझने में मेरी बड़ी मदद की। उनकी महफ़िल में अपनाइयत भी थी और शफ़क़त भी, जिसकी यादें आज तक मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ हैं।
दुकान पर पहुँचकर मैं अक्सर सफ़ाई वग़ैरह के कामों में हाथ बँटाता और फिर इरशाद अंसारी साहब की आमद का इंतज़ार करता। उनके तशरीफ़ लाते ही मेरी कंप्यूटर की क्लास शुरू हो जाती। वह मुझे इनपेज पर ए-फ़ोर साइज़ का एक सफ़्हा बनाकर देते और सामने की-बोर्ड का नक़्शा रख देते, ताकि मैं हुरूफ़ को पहचानकर टाइपिंग की मश्क़ कर सकूँ। मैं अपनी धुन में टाइप करता रहता, यहाँ तक कि पूरा सफ़्हा भर जाता। फिर लिखे हुए मतन को मिटाकर दोबारा मश्क़ शुरू कर देता। यह सिलसिला बार-बार जारी रहता। आज ब-ज़ाहिर यह एक मामूली-सी मश्क़ महसूस हो सकती है, लेकिन उस वक़्त मेरे लिए यह एक नई दुनिया से शनासाई का ज़रिया थी। इरशाद साहब ने बड़ी ख़ामोशी और इस्तिक़ामत के साथ मेरी उँगलियों को की-बोर्ड से वाक़िफ़ कराया और मुझे कंपोज़िंग के इब्तिदाई मराहिल से रूशनास कराया। उनकी इसी मेहनत का नतीजा है कि आज मैं कंप्यूटर पर उर्दू की अहमियत को समझते हुए अपनी सहाफ़ती ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दे रहा हूँ।
इरशाद अंसारी साहब की सबसे नुमायाँ ख़ूबी यह है कि वह अपनी सलाहियतों का शोर नहीं मचाते, बल्कि ख़ामोशी से अपने काम के ज़रिए पहचाने जाते हैं। वह उर्दू के उन मुख़्लिस ख़ादिमों में शामिल हैं, जो शोहरत और नुमाइश से दूर रहकर ज़बान-ओ-अदब की ख़िदमत करते हैं। उनके अंदर कई ऐसी ख़ूबियाँ पोशीदा हैं, जिनसे वाक़िफ़ होने के लिए उनके क़रीब बैठना और उनके साथ वक़्त गुज़ारना ज़रूरी है। वह अपने हुनर पर क़ुदरत रखते हैं, मगर उनकी शख़्सियत की असल ख़ूबसूरती यह है कि वह अपने इल्म और तजुर्बे को दूसरों तक पहुँचाने में बुख़्ल से काम नहीं लेते। मेरे नज़दीक किसी हुनरमंद की अज़मत सिर्फ़ इस बात में नहीं कि वह ख़ुद कितना अच्छा काम करता है, बल्कि इसमें भी है कि वह दूसरों को अपने पैरों पर खड़ा होने के क़ाबिल बनाने के लिए कितना वक़्त और मेहनत सर्फ़ करता है। इरशाद साहब इस ख़ूबी की एक उम्दा मिसाल हैं।
उनकी एक दिलचस्प आदत भी है, जिसका ज़िक्र किए बग़ैर उनकी शख़्सियत का ख़ाका अधूरा रहेगा। वह कभी-कभी भूलने में भी अपनी मिसाल आप नज़र आते हैं। उनके मिज़ाज में मौजूद यह बे-साख़्तगी उनकी शख़्सियत को मज़ीद दिलचस्प बना देती है। अलबत्ता, कंपोज़िंग के मामले में उनका मेयार बहुत सख़्त है। उनके ब-क़ौल, “अगर हमारी कंपोज़िंग में कोई कमी न रह जाए, तो समझ लीजिए कि हमने कंपोज़िंग की ही नहीं।” उनके इस जुमले में ब-ज़ाहिर मज़ाह का रंग है, लेकिन हक़ीक़त में यह उनकी पेशेवराना दियानतदारी और काम के मेयार के बारे में उनके संजीदा रवैये की अक्कासी करता है। वह चाहते हैं कि जो काम भी उनके हाथ से निकले, वह दुरुस्त, साफ़-सुथरा और क़ाबिल-ए-एतिमाद हो। यही वह वस्फ़ है, जो एक आम कारीगर को अपने फ़न का माहिर बनाता है।
उर्दू सहाफ़त के मैदान में भी इरशाद अंसारी साहब की ख़िदमात क़ाबिल-ए-क़द्र हैं। वह मुख़्तलिफ़ उर्दू अख़बारों में बतौर कातिब अपनी ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दे चुके हैं और उर्दू की इशाअत-ओ-तरवीज में अपना हिस्सा डालते रहे हैं। अख़बारों के सफ़्हात पर शाया होने वाली ख़बरों, मज़ामीन और दीगर तहरीरों के पीछे ऐसे ही हुनरमंदों की मेहनत शामिल होती है, जिनके नाम अक्सर क़ारईन की नज़रों से ओझल रहते हैं, मगर जिनके बग़ैर इशाअत का अमल मुकम्मल नहीं हो सकता। इरशाद साहब भी उन्हीं ख़ामोश कारकुनों में से हैं, जिन्होंने अपने फ़न के ज़रिए उर्दू सहाफ़त की ख़िदमत की है। मौजूदा वक़्त में वह ज़िला बाराबंकी के क़स्बा सआदतगंज में वाक़े मदरसा इस्लामिया फ़ैज़ानुल उलूम में बतौर मैनेजर अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं, जबकि फ़ैज़ानुल उलूम इंटर कॉलेज (एफ़.यू.) के सद्र की ज़िम्मेदारी भी अंजाम दे रहे हैं। उनका यह सफ़र इस बात की गवाही देता है कि मेहनत, तजुर्बा और ज़िम्मेदारी का एहसास इंसान को मुख़्तलिफ़ मैदानों में अपनी सलाहियतों के इज़हार का मौक़ा फ़राहम करता है।
उनकी शख़्सियत का एक और क़ाबिल-ए-तहसीन पहलू उनकी बे-लौसी है। मैंने ख़ुद कई मर्तबा देखा है कि अगर कोई शख़्स उनके पास उर्दू या दीनी मौज़ूआत से मुताल्लिक़ मवाद कंपोज़ कराने की ग़रज़ से आता है, तो वह अक्सर मुआवज़ा लेने से गुरेज़ करते हैं। उनके लिए यह काम महज़ रोज़गार का ज़रिया नहीं, बल्कि ज़बान और दीन से वाबस्ता ख़िदमत का एक पहलू भी है। आज के दौर में, जब बेशतर कामों का मेयार उनसे हासिल होने वाले माली फ़ायदे से तय किया जाता है, इरशाद साहब जैसे लोग याद दिलाते हैं कि हुनर की असल क़द्र उस वक़्त बढ़ती है, जब उसके साथ ख़ुलूस और ख़िदमत का जज़्बा भी शामिल हो। उन्होंने अपने फ़न को सिर्फ़ पैसे कमाने का वसीला नहीं बनाया, बल्कि ज़रूरतमंदों के काम आना भी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा रखा है। मेरे नज़दीक यही वह वस्फ़ है, जो उन्हें दूसरों से मुमताज़ करता है।
“सदा-ए-बिस्मिल” के उनवान की डिज़ाइनिंग का ज़िक्र हो, तो इरशाद अंसारी साहब का नाम ख़ुसूसी तौर पर लिया जाना चाहिए। मेरे अख़बार के टाइटल को ख़ूबसूरत और मुनासिब अंदाज़ देने में उन्हीं की फ़न्नी महारत शामिल है। किसी अख़बार का टाइटल महज़ चंद अल्फ़ाज़ की तरतीब नहीं होता, बल्कि वह उसकी शनाख़्त, मिज़ाज और पहचान का पहला तआरुफ़ होता है। इरशाद साहब ने अपनी सलाहियतों के ज़रिए इस शनाख़्त को सँवारने में अहम किरदार अदा किया। जब मैं अपने अख़बार को देखता हूँ, तो उसमें अपनी मेहनत के साथ उनकी महारत और तआवुन का अक्स भी महसूस करता हूँ। यह मेरे लिए महज़ एक पेशेवराना तआवुन नहीं, बल्कि उस शख़्स के एहसान का एतिराफ़ है, जिसने मुझे कंप्यूटर की इब्तिदाई तालीम दी और बाद में मेरे सहाफ़ती सफ़र से वाबस्ता एक अहम काम में भी अपना हिस्सा डाला है।
इरशाद अंसारी साहब सिर्फ़ कंप्यूटर और कंपोज़िंग के माहिर ही नहीं, बल्कि एक ख़ुश-मिज़ाज, मिलनसार और बासलाहियत इंसान भी हैं। खेलों से उनकी दिलचस्पी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह वालीबॉल के बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार किए जाते हैं। खेल इंसान में नज़्म-ओ-ज़ब्त, बर्दाश्त, टीमवर्क और एक-दूसरे के साथ तआवुन का जज़्बा पैदा करता है, और ये ख़ूबियाँ उनकी मजमूई शख़्सियत में भी नुमायाँ महसूस होती हैं। इसी तरह अदबी महफ़िलों से भी उनका गहरा ताल्लुक़ रहा है। वह कई मुशायरों के इनइक़ाद में अपना किरदार अदा कर चुके हैं। उर्दू ज़बान-ओ-अदब से वाबस्तगी रखने वाले अफ़राद के लिए मुशायरे सिर्फ़ तफ़रीह का ज़रिया नहीं होते, बल्कि वह ज़बान की बक़ा, शायरी के ज़ौक़ की आबीआरी और अदबी रिवायत को आगे बढ़ाने का एक अहम वसीला भी हैं। इरशाद साहब की अदबी सरगर्मियाँ उनकी हमाजिहत शख़्सियत का एक और रोशन पहलू हैं।
मेरे लिए इरशाद अंसारी साहब की अहमियत सिर्फ़ उनकी सलाहियतों और ख़िदमात की वजह से नहीं, बल्कि उनके ख़ुलूस और ज़ाती ताल्लुक़ की वजह से भी बहुत ज़्यादा है। वह मेरे वालिद-ए-मोहतरम ज़की तारिक़ बाराबंकवी साहब के हमउम्र हैं और मेरे साथ हमेशा एक शफ़ीक़ चचा जैसा बरताव करते रहे हैं। उनके रवैये में अपनाइयत, मोहब्बत और बुज़ुर्गों जैसी शफ़क़त रही है। मैंने उन्हें हमेशा एक ऐसे शख़्स के तौर पर देखा है, जो लोगों के साथ अच्छा ताल्लुक़ क़ायम रखना जानता है और दूसरों के जज़्बात का एहतराम करता है। मेरे मुशाहिदे में उन्होंने कभी किसी को जान-बूझकर नाराज़ करने की कोशिश नहीं की। ऐसे लोग मुआशरे में मोहब्बत और बाहमी एहतराम की फ़ज़ा क़ायम रखते हैं। उनकी मौजूदगी से रिश्तों में गर्मजोशी और ताल्लुक़ात में एतिमाद पैदा होता है।
उनके वालिद-ए-मोहतरम सेठ मुश्ताक़ अहमद अंसारी साहब मरहूम का ज़िक्र भी मेरे लिए जज़्बाती अहमियत रखता है। वह मुझे बहुत अज़ीज़ रखते थे और उनकी शफ़क़त मुझे हमेशा याद रहेगी। वह हमारे क़स्बे में कई मर्तबा ग्राम प्रधान की ज़िम्मेदारी भी अंजाम दे चुके थे। उनकी शख़्सियत में अवामी ताल्लुक़, मिलनसारी और बुज़ुर्गों वाली मोहब्बत के जो नुक़ूश मैंने देखे, वह आज भी मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ हैं। चंद साल क़ब्ल वह इस दार-ए-फ़ानी से रुख़्सत हो गए। अल्लाह तआला उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन। बाज़ इंसान दुनिया से चले जाने के बाद भी अपने अख़लाक़ और अच्छे बरताव की वजह से लोगों के दिलों में ज़िंदा रहते हैं। मुश्ताक़ अंसारी साहब भी उन्हीं ख़ुशनसीब लोगों में से थे।
आज जब मैं माज़ी की तरफ़ पलटकर देखता हूँ, तो मुझे एहसास होता है कि ज़िंदगी के सफ़र में कुछ छोटे दिखाई देने वाले वाक़िआत दरअसल बड़े नताइज की बुनियाद होते हैं। सुबह सात बजे दुकान पर जाना, कंप्यूटर के सामने बैठना, इनपेज पर एक सफ़्हा खोलना, की-बोर्ड के नक़्शे की मदद से हुरूफ़ तलाश करना और सफ़्हा भर जाने पर दोबारा मश्क़ शुरू कर देना, यह सब ब-ज़ाहिर मामूली बातें थीं, मगर इन्हीं से मेरे अंदर कंप्यूटर और उर्दू कंपोज़िंग का शौक़ परवान चढ़ा। अगर इरशाद अंसारी साहब ने उस वक़्त मेरी रहनुमाई न की होती, मुझे मश्क़ का मौक़ा न दिया होता और मेरे अंदर इस हुनर की बुनियाद न रखी होती, तो शायद आज मैं इस एतिमाद के साथ अपना अख़बार “सदा-ए-बिस्मिल” शाया करने के क़ाबिल न होता। इसलिए मैं अपने सहाफ़ती सफ़र की बुनियादों में उनकी मेहनत को हमेशा याद रखूँगा।
मेरे नज़दीक किसी उस्ताद की सबसे बड़ी कामयाबी यह नहीं कि उसके शागिर्द उसका नाम कितनी मर्तबा लेते हैं, बल्कि यह है कि उसकी दी हुई तालीम से कितने लोगों की ज़िंदगियों में बेहतरी आती है। इरशाद अंसारी साहब ने मुझे जो कुछ सिखाया, वह मेरे लिए महज़ कंप्यूटर चलाने या टाइपिंग करने का हुनर नहीं था, बल्कि मेरे ख़्वाब को अमली शक्ल देने की सिम्त एक अहम क़दम था। आज “सदा-ए-बिस्मिल” के ज़रिए उर्दू सहाफ़त से अपनी वाबस्तगी बरक़रार रखने की कोशिश करता हूँ, तो उसके पस-ए-मंज़र में उनकी इब्तिदाई रहनुमाई का भी एक रोशन हिस्सा मौजूद है। मैं उनके इस एहसान को कभी फ़रामोश नहीं कर सकता।
अल्लाह तआला से दुआ है कि वह मेरे मोहतरम उस्ताद इरशाद अंसारी साहब को सेहत-ओ-आफ़ियत वाली लंबी उम्र अता फ़रमाए, उनके रिज़्क़ में बरकत दे, उनके इल्म-ओ-हुनर को मज़ीद तरक़्क़ी अता करे और उन्हें इसी तरह उर्दू ज़बान-ओ-अदब की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ बख़्शता रहे। अल्लाह तआला उनकी बे-लौस ख़िदमात को क़ुबूल फ़रमाए और उनकी ज़िंदगी को ख़ुशियों, सुकून और कामयाबियों से भर दे। आमीन।
इरशाद अंसारी साहब! आपने मुझे कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ चलाना सिखाया था, मगर वक़्त ने मुझे यह एहसास भी दिलाया कि आपने दरअसल मेरे ख़्वाबों को अल्फ़ाज़ देने का रास्ता दिखाया था। आज “सदा-ए-बिस्मिल” की सूरत में जो आवाज़ क़ारईन तक पहुँच रही है, उसकी बुनियादों में आपकी तालीम, शफ़क़त और ख़ुलूस का हिस्सा हमेशा शामिल रहेगा। उस्ताद का एहसान कभी अदा नहीं किया जा सकता, अलबत्ता उसे याद रखना और बरमला तस्लीम करना शागिर्द की अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है। मेरे लिए यह तहरीर इसी ज़िम्मेदारी की एक छोटी-सी अदायगी है।
मज़मून निगार ऑल इंडिया माइनॉरिटीज़ फ़ोरम फ़ॉर डेमोक्रेसी के शोबा-ए-नश्र-ओ-इशाअत के सेक्रेटरी हैं।
