
भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा पर राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ
शिक्षा की चुनौतियों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय मूल्यों पर चार सत्रों में हुआ मंथन
वाराणसी। अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी में शनिवार, 24 अक्टूबर को “भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा” विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। भारत माता एवं मां सरस्वती के चित्रों पर पुष्पार्चन के साथ शुरू हुई कार्यशाला में पहले दिन चार सत्र आयोजित किए गए।
उद्घाटन सत्र में प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता श्री डी. रामकृष्ण राव ने शिक्षा की मूलभूत चुनौतियों और उनके समाधान में विद्वत परिषद की भूमिका बताई। अध्यक्षता करते हुए निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने संस्कार, आत्मबोध एवं आचार्य के गुणों पर विचार रखे। संचालन डॉ. सुनील कुमार त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रदीप जायसवाल ने किया।
द्वितीय सत्र में विद्या भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री गोबिंद चंद्र महंत ने शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति में शिक्षा संस्थानों और हितधारकों की भूमिका पर विचार रखे। अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने की। संचालन डॉ. कुशाग्री सिंह ने किया।
तृतीय सत्र में प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन में शिक्षकों एवं संस्थानों की भूमिका बताई। अध्यक्षता राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई), नई दिल्ली के सदस्य श्री डी. रामकृष्ण राव ने की। संचालन डॉ. कुशाग्री सिंह ने किया।
चतुर्थ सत्र में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष श्री अवनीश भटनागर ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर जोर दिया। अध्यक्षता केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, वाराणसी के कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने की। संचालन डॉ. राजा पाठक ने किया।
कार्यशाला में संस्थान के अधिकारी, शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। प्रथम दिवस का समापन वंदे मातरम् के साथ हुआ। कार्यशाला का समापन रविवार, 25 अक्टूबर को होगा।
