
जाति जनगणना और आरक्षण सामाजिक न्याय का आधार: अशोक विश्वकर्मा।
जाति आधारित व्यवस्था भारतीय समाज का शाश्वत और मूलभूत यथार्थ।
वाराणसी। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ओबीसी विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य अशोक कुमार विश्वकर्मा ने एक विज्ञप्ति में कहा है की जाति जनगणना सामाजिक न्याय और आरक्षण का मूल आधार है क्योंकि यह विभिन्न जातियों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति का सटीक विवरण देती है, जिससे सरकारी योजनाओं, आरक्षण और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित होता है। उन्होंने कहा जाति जनगणना हाशिए पर पड़े समुदायों की पहचान कर उन्हें सशक्त बनाने, असमानताओं को दूर करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने में मदद करती है। यह विभिन्न जाति समूह के सामाजिक आर्थिक वितरण को आसान बनाता है। जिससे सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याण से संबंधित सरकारी नीतियों को प्रभावी रूप से तैयार करना आसान होता है। उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना से पता चला था कि देश में लगभग 46 लाख जातियां और उपजातियां हैं। जाति जनगणना और आरक्षण से जाति समूह में असंख्य वंचित उप समूहों को भी सामाजिक आर्थिक रूप से मुख्य धारा में आने का अवसर मिलेगा,जो उनके लिए सामाजिक न्याय की वास्तविकता को शाश्वत और यथार्थ करेगी। उन्होंने बताया कि देश की आजादी के 70 सालों बाद आज भी 90% दलित-पिछड़ी और आदिवासी शोषित वंचित समूह को मनुवादी व्यवस्था में मौजूदा आरक्षण की व्यवस्था से कुछ खास हासिल नहीं हुआ तथा सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक शोषण में कोई कमी नहीं आई है। उन्होंने कहा कि 1990 में तत्कालीन प्रधान मंत्री वी पी सिंह ने जैसे ही देश की संसद में मंडल आयोग की मात्र एक अनुशंसा को स्वीकार करते हुए नौकरियों में शूद्र जातियों को सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने की घोषणा की तो एक झटके में देश की राजनीति में तूफ़ान पैदा हो गया। उन्होंने बताया कि दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण 1947 के पहले से मौजूद है, किन्तु जब 1990 में मंडल के माध्यम से देश की बावन प्रतिशत आबादी को आरक्षण की परिधि में लाया गया तो आरक्षित श्रेणियों को मिलाकर 1931 की जनगणना के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत से अधिक आबादी आरक्षण की परिधि में आ गयी। जिससे सामाजिक न्याय और परिवर्तन का एजेंडा राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने लगा।बीसवीं सदी भारतीय राजनीति में आरक्षण के समर्थक और विरोधी शक्तियों के बीच संघर्षों का दौर रहा है।आरक्षण ने सत्ता, संपत्ति और सम्मान पर चंद जातियों के एकाधिकार को तोड़कर इसके दलित, आदिवासी, अति पिछड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को पैदा किया। जिससे भारतीय समाज और राजनीति के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को बल मिला है। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण को खत्म कर दिया जाए तो भारतीय समाज एक झटके में सौ साल पीछे चला जाएगा। जब दलित अपने कमर में झाडू बाँध कर चलते थे। आदिवासी नगर सभ्यता से दूर रहते थे, और शूद्र जातियाँ प्रताड़ना और वंचना की शिकार थी। आरक्षण के चलते दलित, आदिवासी, अति पिछड़ी, पिछड़ी जातियों में एक मध्यम वर्ग तैयार हुआ है। आरक्षण सामाजिक न्याय का एक उपाय है किन्तु यह आर्थिक न्याय के बगैर अधूरा है। भारत के संविधान की प्रस्तावना में भारत के नागरिकों को सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। आरक्षण के तमाम जनपक्षीय उपलब्धियों के बावजूद इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि नौकरशाही और आम जनता के बीच दूरी आज भी कायम है। भारत में दलित-पिछड़ा-आदिवासी राजनीतिकों की राजनीति में जो दस्तक सुनायी पड़ रही है वह आरक्षण की राजनीति के चलते संभव हुआ है। जब-जब किसी राज्य में आरक्षण लागू हुआ है उन राज्यों में जातियों का सामाजिक-राजनीतिक जागरण हुआ है और सत्ता की राजनीति में उनके नेताओं ने अपना दावा मजबूत किया है। आरक्षण की राजनीति से दलित-पिछड़ों की राजनीति को बार-बार संवेग प्राप्त हुआ है।1978 में लागू आरक्षण ने पिछड़ों और अत्यंत पिछड़ों में सामाजिक-राजनीतिक चेतना का विस्फोट किया। यह मंडल की देन है कि आज पूरे देश की राजनीति में पिछड़ों की पूछ हो रही है।मंडल ने देश की बावन प्रतिशत आबादी को चाहे वह कोई भी धर्म मानते हों या भाषा बोलते हों उन्हें ओबीसी, के रूप में एक पहचान और एक चेतना, दिया। आज उत्तर,दक्षिण,पश्चिम और पूर्वी भारत के पिछड़े अपने को ओबीसी कहते हैं और आपस में एक जगह बैठकर मशविरा करते हैं। मंडल के चलते सामाजिक न्याय की लड़ाई ने पूरे देश की दलित पिछड़ी जनता को प्रेरित किया है। आर्थिक आधार पर आरक्षण जाति आधारित आरक्षण के लिए मौत का वारंट है। सिद्धांत विहीन राजनीति सामाजिक न्याय के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। मंडल के अनुसार जाति भारतीय समाज का मूलभूत यथार्थ है। धर्म बदला जा सकता है किंतु जाति नहीं बदली जा सकती है।
