धर्मेन्द्र कसौधन/ब्यूरो
लखनऊ: क्या आप एक ऐसे स्कूल की कल्पना कर सकते हैं जहाँ कुर्सियाँ खाली हैं, मैदान सूना है, एक भी बच्चा पढ़ने नहीं आता, लेकिन सरकार वहाँ 177 शिक्षकों को वेतन दे रही है? और ठीक इसके विपरीत, एक ऐसा स्कूल जहाँ सैकड़ों बच्चे तो हैं, लेकिन पूरी वर्णमाला से लेकर गणित के फॉर्मूले तक, सब कुछ सिखाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक अकेले शिक्षक के कंधों पर है?
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की कड़वी और जमीनी हकीकत है। केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी यू-डायस प्लस (U-DISE+) 2025-26 के ताजा आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि सूबे में चुनौती नए स्कूल खोलने या शिक्षकों की नई फौज खड़ी करने की नहीं है, बल्कि जो संसाधन पहले से मौजूद हैं, उनका सही और संतुलित इस्तेमाल करने की है।
आंकड़ों के दो छोर
रिपोर्ट के पन्नों को पलटें तो यूपी की शिक्षा व्यवस्था के दो बिल्कुल अलग और चौंकाने वाले चेहरे सामने आते हैं:
- बिना छात्रों के स्कूल: प्रदेश में 313 सरकारी स्कूल ऐसे पाए गए हैं, जहाँ कागजों पर या मैदान में एक भी छात्र नामांकित (शून्य नामांकन) नहीं है। हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद इन स्कूलों में 177 शिक्षक तैनात हैं।
- एक शिक्षक के भरोसे भविष्य: दूसरी तरफ, 7,874 स्कूल ऐसे हैं जहाँ पूरा विद्यालय सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहा है। इन एकल-शिक्षक स्कूलों में 4,85,071 छात्रों का भविष्य दांव पर है, जहाँ एक ही गुरु जी को सभी कक्षाएं और सभी विषय संभालने पड़ रहे हैं।
कागजी ‘औसत’ और जमीनी ‘असंतुलन’
अगर हम उत्तर प्रदेश के कुल आंकड़ों को देखें, तो तस्वीर काफी खूबसूरत नजर आती है, लेकिन यह जमीनी मोर्चे पर फैली असमानता को पूरी तरह छिपा देती है:
| श्रेणी | कुल संख्या / अनुपात |
|---|---|
| कुल विद्यालय | 2,65,278 |
| कुल विद्यार्थी | 4,27,03,359 |
| कुल शिक्षक | 16,42,764 |
| छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) | 26:1 (औसतन 26 छात्रों पर 1 शिक्षक) |
| प्रति स्कूल औसत | 161 छात्र और 6 शिक्षक |
कागजों पर हर स्कूल में 6 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों स्कूलों में एक भी अतिरिक्त हाथ मदद के लिए मौजूद नहीं है।
स्कूल ज्यादा, उपयोग कम: यूपी देश के उन 12 राज्यों में शामिल
यू-डायस की रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर इशारा करती है। उत्तर प्रदेश उन 12 राज्यों में शुमार है जहाँ आबादी और छात्रों के अनुपात में स्कूलों की संख्या जरूरत से ज्यादा है। यानी, यहाँ बने-बनाए बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का पूरा इस्तेमाल ही नहीं हो पा रहा है।
- यूपी जैसी स्थिति वाले अन्य राज्य: मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और मेघालय।
- विपरीत स्थिति वाले राज्य (जहाँ स्कूलों पर छात्रों का भारी दबाव है): दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा और केरल। इन राज्यों में स्कूलों की संख्या छात्रों के मुकाबले कम है।
अब सिर्फ ‘बढ़ाना’ नहीं, ‘संभालना’ होगा-विशेषज्ञ
शिक्षा जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। अब वक्त आ गया है कि सरकार अपनी रणनीति बदले।
बदलाव की कुंजी: केवल नए स्कूल खोलना या नई भर्तियां करना शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधार सकता। सबसे पहले उन 313 स्कूलों के शिक्षकों को जरूरत वाले स्थानों पर भेजना होगा जहाँ बच्चे शिक्षक की राह देख रहे हैं। इसके साथ ही, 7,800 से अधिक एकल-शिक्षक वाले स्कूलों में तुरंत अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती करनी होगी, ताकि किसी भी बच्चे की पढ़ाई से समझौता न हो।
