बेजुबान जीवों की रक्षक ‘कहकशां अंजुम खान’: लखीमपुर खीरी में महिला सशक्तिकरण और जीव दया की अनूठी मिसाल
लेखक: के. एम. आमिश
लखीमपुर खीरी (विशेष संवाददाता)। उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा और तराई की हरियाली से समृद्ध जनपद ‘लखीमपुर खीरी’ आज एक अनोखी वजह से सुर्खियों में है। ज़िले के कस्ता विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत उसरी पिपरझला से महिला सशक्तिकरण, दया और करुणा की एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है, जिसने समाज को एक नई राह दिखाई है। यहाँ की निवासी मिस कहकशां अंजुम खान बेजुबान जानवरों और पक्षियों के लिए एक मसीहा बनकर उभरी हैं।


उच्च शिक्षित और संस्कारों से समृद्ध पृष्ठभूमि
20 जून 1980 के दशक में जन्मी कहकशां अंजुम खान की माता, स्वर्गीय श्रीमती किश्वर जहां, कस्ता के पूर्व उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या थीं। अपनी मां के मार्गदर्शन में ही कहकशां ने बचपन में ही प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ दूसरों की मदद करना, समस्याओं का समाधान ढूंढना, और विज्ञान व तकनीक की गहरी समझ विकसित करना सीख लिया था। कहकशां एक उच्च शिक्षित महिला हैं। उन्होंने विज्ञान (जीव विज्ञान/लाइफ साइंसेज) विषय से B.Sc (स्नातक) की डिग्री हासिल की है। इसके बाद उन्होंने प्रबंधन के क्षेत्र में MBA किया और समाज सेवा से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण कोर्स, डिग्री व डिप्लोमा भी प्राप्त किए हैं।


बिना किसी स्वार्थ के पशु सेवा में समर्पित जीवन
अपनी उच्च शिक्षा का उपयोग कहकशां ने बेजुबान जीवों के हक और उनके संरक्षण के लिए किया है। बिना किसी सरकारी या बाहरी आर्थिक सहायता के, वे अपनी खुद की जमीन और अपनी कमाई के लाखों रुपये इन बेजुबानों के इलाज और रखरखाव में लगा रही हैं। उनके सेवा कार्यों की सूची बेहद लंबी है: सड़क हादसों में घायल जीवों का इलाज: एक्सीडेंट के शिकार हुए जानवरों को समय पर इलाज और आश्रय देना।
आवारा पशुओं का भरण-पोषण: गली के कुत्तों, बिल्लियों, बकरियों और गायों के लिए नियमित भोजन और चारे की व्यवस्था करना।
पक्षियों का संरक्षण: बेघर पक्षियों के लिए घोंसले बनाने और दाने-पानी की व्यवस्था में सहयोग करना।
अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना: घोड़ा-तांगा चलाने वालों द्वारा बेधड़क अत्यधिक बोझ लादने पर कड़ा विरोध दर्ज कराना।
अवैध हिंसा पर रोक: गांव या क्षेत्र के लोगों द्वारा जानवरों को लाठी-डंडों से पीटने या उन पर वार करने पर कानूनी व सामाजिक तौर पर आपत्ति जताना।
डॉ. सालिम अली की प्रेरणा: पहाड़ों और जंगलों में वन्यजीवों पर शोध
कहकशां केवल पशुओं के इलाज तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति के प्रति भी उनका लगाव बेहद गहरा है। विभिन्न वानिकी (फॉरेस्ट्री) क्षेत्रों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में घूमकर पशु-पक्षियों के व्यवहार को बारीकी से समझना और उन पर शोध करना उनके जीवन का मुख्य शौक है।
कहकशां बताती हैं कि उन्हें यह प्रेरणा भारत के महान पक्षी विज्ञानी और ‘बर्डमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. सालिम अली के जीवन से मिली है। डॉ. सालिम अली के ही पदचिह्नों और सिद्धांतों पर चलते हुए वे वन्यजीवों और प्रकृति की गहराइयों को समझ रही हैं। उन्हीं के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़कर वह पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करना चाहती हैं।
दो दिल छू लेने वाली वास्तविक घटनाएं
कहकशां के साहस और पशु प्रेम को उनके जीवन की दो मुख्य घटनाओं से आसानी से समझा जा सकता है:
पिल्ले की जान बचाई और पुलिस से दिलाया न्याय: उनके पैतृक गांव उसरी पिपरझला में एक स्थानीय महिला ने उनके सामने ही एक छोटे से पिल्ले (कुत्ते के बच्चे) को बेरहमी से पीटा और उसकी टांगें पकड़कर दूर खेत में फेंक दिया। कहकशां से यह क्रूरता बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने तुरंत पिल्ले का पूरा इलाज कराया। जब उस पड़ोसी महिला ने दोबारा विवाद खड़ा किया, तो मामला पुलिस तक पहुंचा। कहकशां के पास ‘एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिसके चलते क्षेत्रीय पुलिस ने उनका पूरा सहयोग किया। नतीजतन, दोषी महिला को अपनी इस क्रूरता के लिए लिखित में माफी मांगनी पड़ी। मृत घोषित जानवर को दिया नया जीवन: एक बार क्षेत्रीय हाईवे पर एक गंभीर सड़क हादसे में एक जानवर को लोगों ने मरा हुआ समझ लिया था। कहकशां उस बेजुबान को उठाकर अपने घर ले आईं, उसका दिन-रात इलाज किया और आज वह जानवर पूरी तरह स्वस्थ होकर उनके संरक्षण में रह रहा है। इसी तरह ‘सृष्टि’ नाम की एक फीमेल डॉग पिछले 5 वर्षों से लगातार उनके साथ रह रही है, जो कहकशां के इशारों और बातों को बखूबी समझती है और उनके रोजमर्रा के कामों में सहयोग भी करती है।
“इंसान की मानवता पर ही निर्भर हैं बेजुबान”
कहकशां अंजुम खान का मानना है कि ये बेजुबान जीव पूरी तरह से हम इंसानों के भरोसे हैं। अगर इन्हें चोट लगेगी या ये बीमार होंगे, तो ये किसी से मांगकर नहीं खा सकते और न अपना दर्द बयां कर सकते हैं। इसलिए यह हम इंसानों का परम कर्तव्य है कि हम आगे आकर इनकी मदद करें। उनका भविष्य का संकल्प है कि वे जानवरों के अधिकारों (Animal Ethics) को ध्यान में रखते हुए ‘एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट’ को पूरे जिले में कड़ाई से लागू कराने की वकालत करेंगी। वे गांव-गांव, गली-गली और मोहल्ले-मोहल्ले जाकर जानवरों के संरक्षण के लिए एक बड़ा जागरूकता अभियान (मुहिम) चलाने की तैयारी में हैं।
समाज का पूर्ण समर्थन और सम्मान का वादा
एक महिला होकर ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में अकेले दम पर इस तरह का साहसी और कठिन कार्य करना अपने आप में महिला सशक्तिकरण की एक अद्भुत मिसाल है। उनके इसी जज्बे को देखते हुए बहुआयामी परिवार और स्थानीय समाज उनके इस अभूतपूर्व कार्य के लिए उनका धन्यवाद और आभार प्रकट करता है। समाज ने उनके इस अभियान को अपना पूर्ण समर्थन दिया है और वादा किया है कि आने वाले समय में उन्हें एक बड़े और भव्य सार्वजनिक मंच पर सम्मानित किया जाएगा। कहकशां के इस प्रयास से प्रेरित होकर आज क्षेत्र के सैकड़ों लोग इस नेक काम से जुड़ चुके हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में उनकी इस अनूठी पहल से हजारों अन्य महिलाएं भी प्रेरित होंगी और जीव दया के इस मार्ग पर चलकर महिला सशक्तिकरण की एक नई इबारत लिखेंगी।

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