पुलिस थानों में कैमरों के संचालन, रिकॉर्डिंग की सुरक्षा और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के औचक निरीक्षण पर उठाए सवाल; पारदर्शिता और मानवाधिकारों की सुरक्षा की दिशा में अहम पहल
रिपोर्ट – धर्मेन्द्र कसौधन (एमडी न्यूज़)
महराजगंज। उत्तर प्रदेश के पुलिस थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की वास्तविक स्थिति, उनके नियमित संचालन और रिकॉर्डिंग की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर जवाबदेही का सवाल सामने आया है। थानों में हिरासत के दौरान नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से जनहित याचिकाकर्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता विनय कुमार पांडे ने सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत आवेदन दाखिल कर महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी हैं।

विनय कुमार पांडे, एडवोकेट, सह-संस्थापक बॉर्डर लॉयर्स ट्रस्ट (Border Lawyers Trust), जनपद महराजगंज, उत्तर प्रदेश ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में प्रदेश के समस्त जनपदों के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) एवं न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा पुलिस थानों के किए जाने वाले औचक निरीक्षणों से संबंधित दिशा-निर्देशों और उनकी अनुपालन स्थिति का विवरण मांगा है। इस आरटीआई के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया है कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा पुलिस थानों का औचक निरीक्षण करने की व्यवस्था किस स्तर तक लागू की जा रही है। साथ ही, निरीक्षण से संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुपालन, निरीक्षण रिपोर्ट और सीसीटीवी कैमरों की वास्तविक कार्यशील स्थिति के बारे में भी जानकारी मांगी गई है।

थानों में CCTV की वास्तविक स्थिति जानना उद्देश्य
पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने का प्रमुख उद्देश्य पुलिस कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखना, हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार की रोकथाम करना तथा थानों में होने वाली गतिविधियों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना है। लेकिन केवल कैमरे लगा देना पर्याप्त नहीं है। उनका लगातार चालू रहना, सभी आवश्यक स्थानों पर कवरेज होना, रिकॉर्डिंग का निर्धारित अवधि तक सुरक्षित रहना और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।इसी बिंदु को केंद्र में रखते हुए अधिवक्ता विनय कुमार पांडे ने आरटीआई के जरिए व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने लाने की पहल की है। उनका प्रयास है कि सरकारी अभिलेखों के माध्यम से यह स्पष्ट हो सके कि प्रदेश के पुलिस थानों में सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है और न्यायिक अधिकारियों द्वारा निर्धारित निरीक्षण प्रक्रिया का कितना पालन किया जा रहा है।
औचक निरीक्षण की व्यवस्था पर भी मांगा जवाब
आरटीआई में विशेष रूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों एवं न्यायिक मजिस्ट्रेटों द्वारा पुलिस थानों के औचक निरीक्षण से संबंधित गाइडलाइन और उसके अनुपालन का विवरण मांगा गया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि संबंधित न्यायिक अधिकारियों द्वारा निर्धारित व्यवस्था के तहत थानों का निरीक्षण किया जा रहा है या नहीं तथा निरीक्षण के दौरान सामने आने वाली कमियों को दूर करने के लिए क्या कार्रवाई की जाती है।न्यायिक अधिकारियों के औचक निरीक्षण को पुलिस थानों की कार्यप्रणाली पर स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने की महत्वपूर्ण व्यवस्था माना जाता है। ऐसे में निरीक्षण रिपोर्ट और अनुपालन संबंधी अभिलेख सार्वजनिक जवाबदेही की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

मानवाधिकार संरक्षण और पारदर्शिता पर जोर
अधिवक्ता विनय कुमार पांडे का मानना है कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की प्रभावी निगरानी व्यवस्था मानवाधिकारों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। विशेषकर हिरासत में रखे गए व्यक्तियों की सुरक्षा, पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता और किसी भी विवाद की स्थिति में घटनाक्रम की वास्तविकता सामने लाने में रिकॉर्डिंग अहम भूमिका निभा सकती है।उन्होंने आरटीआई के माध्यम से यह पहल करते हुए व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने और न्यायिक निगरानी की वास्तविक स्थिति को सामने लाने का प्रयास किया है। इस पहल से यह भी स्पष्ट होने की उम्मीद है कि सीसीटीवी व्यवस्था को लेकर जारी दिशा-निर्देशों का पालन कागजों तक सीमित है या धरातल पर भी प्रभावी ढंग से किया जा रहा है।
जवाब मिलने के बाद सामने आएगी व्यवस्था की तस्वीर
अब इस आरटीआई पर संबंधित विभागों और लोक सूचना अधिकारियों के जवाब का इंतजार है। प्राप्त होने वाली सूचनाओं से प्रदेश के विभिन्न जनपदों में थानों के सीसीटीवी कैमरों के संचालन, न्यायिक मजिस्ट्रेटों के निरीक्षण और संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुपालन की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है।अधिवक्ता विनय कुमार पांडे की यह पहल केवल सूचना प्राप्त करने तक सीमित नहीं, बल्कि कानून के शासन, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। अब देखना होगा कि आरटीआई के जवाब में सरकारी अभिलेखों से थानों की निगरानी व्यवस्था की कितनी वास्तविक तस्वीर सामने आती है।
