विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना पुश्तैनी पेशे से जुड़ी जातियों के खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र: अशोक विश्वकर्मा

पारंपरिक पेशे से जुड़ी वंचित जातियों के सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता मे बाधक है,विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना।

वाराणसी। ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने कहा है कि सरकार षड्यंत्र के तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों को उनके जातिगत पेशे से बाहर नहीं निकलने देना चाहती है। उन्होंने कहा कि पुश्तैनी पेशे से जुड़े आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वंचित समाज के लोगों का कुछ लोग लगातार हक हड़प रहे हैं। वंचित और शोषित समाज के इन परंपरागत कारीगरों पर ईडब्ल्यूएस और एनएफएस (NOT FOUND SUITABLE) की दोधारी तलवार चलाई जा रही है। इस समाज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के नेता मूकदर्शक बने हैं। विश्वकर्मा ने कहाकि प्रधानमंत्री विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना की आड़ में सरकार लोगों को उनके पुश्तैनी और पारंपरिक पेशे से बाहर निकलने नहीं देना चाहती है। यह योजना वंचित जातियों को उनके पैतृक व्यवसाय में सीमित रखने का राजनीतिक षड्यंत्र है। यह जाति आधारित पेशे को बढ़ावा देती है और उनके सामाजिक तथा आर्थिक प्रगति में बाधक है। उन्होंने कहा यह योजना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, सभी वर्गों को मुख्यधारा के उच्च भुगतान वाले व्यवसाय में समान अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर, यह योजना जाति आधारित श्रम विभाजन को बनाए रखती है और जाति आधारित पहचान को बढ़ावा देती है। सरकार को चाहिए कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वंचित समाज के लोगों को पारंपरिक कामों से निकालकर आधुनिक शिक्षा और तकनीक की ओर ले जाए न कि उन्हें पुश्तैनी पेशे में ही रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यह योजना दबे-कुचले वर्गों के बच्चों को उनके पारंपरिक व्यावसायो तक सीमित रखती है जिससे उनकी सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता बाधित होती है। उन्होंने इस योजना को पुरानी बोतल में नई शराब कहा है जो वर्ण आश्रम व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है और जन्म के आधार पर काम निर्धारित करने की कुप्रथा को बढ़ावा देती है। इस योजना में नाव बनाने वाले, बढ़ई, अस्त्र-शस्त्र बनाने वाले, लोहार, हथौड़ा बनाने वाले व टूल किट बनाने वाले, ताला बनाने वाले, मूर्तिकार, पत्थर तरासने वाले, सुनार, कुम्हार, मोची, राजमिस्त्री, टोकरी, चटाई, झाड़ू बनाने वाले, गुड़िया व खिलौने बनाने वाले, नाई, मालाकार (गारलैंड मेकर), धोबी, दरजी व मछली का जाल बनाने वाले परंपरागत कारीगर शामिल हैं। उन्होंने कहा यह योजना कारीगरों की बहुआयामी समस्याओं को हल नहीं करती है जिससे वह कम आय वाले पारंपरिक व्यवसाय में फंसे रहते हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि पुश्तैनी पेशे में लगे परंपरागत कारीगरों के आर्थिक विकास लिए पृथक हस्तशिल्प विकास एवं कल्याण बोर्ड का गठन होना चाहिए।

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