वरिष्ठ समाजसेवी जावेद खाँ की नवासी अलविया की अटूट आस्था और धैर्य बना चर्चा का विषय।

रामपुर। रमज़ान का पाक महीना मुसलमानों के लिए इबादत, सब्र और आत्मसंयम का महीना माना जाता है। इस पवित्र महीने में रोज़ा रखना न केवल धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह इंसान के चरित्र और अनुशासन को भी मजबूत बनाता है।

जनपद रामपुर की सात वर्षीय बच्ची अलविया खान इन दिनों अपनी मासूम उम्र में रोज़ा रखकर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। अलविया पिछले दो वर्षों से रमज़ान के महीने में नियमित रूप से रोज़े रख रही हैं, जो उनकी आस्था, धैर्य और मजबूत संस्कारों को दर्शाता है।
अलविया, रामपुर के मोहल्ला मोती मस्जिद निवासी युसरा खान की बेटी और वरिष्ठ समाजसेवी जावेद खाँ की नवासी हैं। उनका परिवार धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा है। जावेद खाँ न केवल पाँच वक्त के पाबंद नमाज़ी हैं, बल्कि मोती मस्जिद कमेटी के सचिव भी रह चुके हैं और समाज सेवा के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा है। उनके धार्मिक जीवन और सामाजिक कार्यों का प्रभाव अलविया की परवरिश में भी साफ दिखाई देता है।

अलविया की माता युसरा खान ने भी बेटी की परवरिश में विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने बचपन से ही अलविया को धार्मिक शिक्षा, अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्यों की सीख दी, जिससे बच्ची में छोटी उम्र में ही इबादत और अनुशासन की भावना विकसित हुई। माँ के द्वारा दिया गया सही मार्गदर्शन और प्रेमपूर्ण वातावरण बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसका उदाहरण अलविया हैं।

अलविया खान ने मासूम अंदाज़ में कहा,
“मुझे रोज़ा रखना अच्छा लगता है। अम्मी और नाना मुझे दुआएँ सिखाते हैं, मैं अल्लाह से सबके लिए दुआ करती हूँ।”

इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार बच्चों पर रोज़ा बालिग होने के बाद ही फ़र्ज़ होता है, लेकिन बचपन से रोज़ा रखने की आदत उन्हें सब्र, संयम और आत्मनियंत्रण सिखाती है। अलविया की लगन यह दर्शाती है कि यदि बच्चों की परवरिश धार्मिक और नैतिक मूल्यों के साथ की जाए तो वे कम उम्र में ही जिम्मेदारी और ईमानदारी जैसी खूबियाँ सीख लेते हैं।

अलविया खान जैसी बच्चियां समाज के लिए प्रेरणा हैं। उनकी मासूम इबादत और परिवार की अच्छी परवरिश यह संदेश देती है कि संस्कार और धर्म की शिक्षा बचपन से दी जाए तो आने वाली पीढ़ी मजबूत चरित्र और नेक सोच के साथ आगे बढ़ती है।

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