अयोध्या। प्रभु श्री राम की नगरी में जहां एक ओर भव्य मंदिर निर्माण से विकास की बयार बह रही है, वहीं दूसरी ओर भू-माफियाओं की गिद्ध दृष्टि सरकारी और नजूल जमीनों पर कुछ इस कदर जमी है कि अब आम नागरिक का जीना दूभर हो गया है। ताजा मामला बेनीगंज चौराहे का है, जहां एक पीड़ित परिवार ने न केवल सार्वजनिक भूमि पर कब्जे की शिकायत की है, बल्कि प्रशासन के रवैये से त्रस्त होकर क्षेत्र से पलायन करने तक की चेतावनी दे दी है। यह प्रकरण अयोध्या में फल-फूल रहे कथित भू-माफिया सिंडिकेट और उसमें विभागीय अधिकारियों की संलिप्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।पीड़ित मनीष कुमार, जो लंबे समय से न्यूरो की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, इस विवाद की भेंट चढ़ गए हैं। मनीष का आरोप है कि उनके घर के समीप स्थित लगभग 400 स्क्वायर फीट की सार्वजनिक नजूल भूमि पर दबंगों ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। मनीष का दावा है कि सरकारी दस्तावेजों और गाटा संख्या के अनुसार यह भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए है लेकिन भू-माफियाओं ने विभागीय साठगांठ से इसके स्वरूप को बदलने का खेल रचा है। विडंबना देखिए कि इस मानसिक तनाव और धमकियों के चलते मनीष की वह न्यूरो की बीमारी पुनः उभर आई है, जिसकी दवाइयां इलाज के बाद बंद हो चुकी थीं। अब उन्हें भारी मन से वही दवाइयां दोबारा शुरू करनी पड़ी हैं।

पीड़ित का कहना है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र में अकेले हिंदू परिवार होने के नाते उन्हें लगातार निशाना बनाया जा रहा है और सुरक्षा के अभाव में उनका पूरा परिवार भय के साये में जीने को मजबूर है।अयोध्या के तमाम मोहल्लों से भी सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की खबरें आए दिन सुर्खियां बनती हैं लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही नजर आती है। आम जनता के बीच आज यह बड़ा सवाल है कि जब अवैध प्लाटिंग और निर्माण का खेल शुरू होता है, तब जिम्मेदार विभाग और उनके अधिकारी आंखें क्यों मूंद लेते हैं लोगों का तर्क है कि मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत बुलडोजर केवल उस गरीब जनता पर क्यों चलता है जो अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर घर बनाती है? कार्रवाई की जद में वे अधिकारी और भू-माफिया क्यों नहीं आते, जिनके संरक्षण में यह पूरा सिंडिकेट साल 2017 से लगातार सक्रिय है जनता मांग कर रही है कि इन अधिकारियों को पदमुक्त कर इनके संपत्ति की भी जांच होनी चाहिए।इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए जब मीडिया कर्मियों द्वारा एआरओ से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझा। हालांकि नायब तहसीलदार ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए आश्वासन दिया है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और साक्ष्यों के आधार पर विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। दूसरी ओर, सिस्टम की बेरुखी से हार चुके मनीष कुमार ने साफ कहा है कि यदि सरकारी जमीन कब्जा मुक्त नहीं हुई और उनके परिवार को सुरक्षा नहीं मिली, तो पलायन ही अंतिम रास्ता बचेगा। अब शासन-प्रशासन की साख दांव पर है कि क्या वे एक बीमार नागरिक को न्याय दिला पाते हैं या रामनगरी में भू-माफियाओं का यह सिंडिकेट ऐसे ही बेखौफ राज करता रहेगा।

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