अयोध्या।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिन-रात ‘सबका साथ, सबका विकास’ और जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं। मगर अयोध्या विकास प्राधिकरण की जमीन पर हकीकत इससे उलट है। महायोजना 2031 की आड़ में चल रही अफसरशाही की हठधर्मिता कहीं 2027 विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए ‘सेल्फ गोल’ न बन जाए। 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे सबके सामने हैं। अगर प्राधिकरण का यही रवैया रहा तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
एक तरफ माफिया मालामाल, दूसरी तरफ गरीब पर लटकी सीलिंग की तलवार
प्राधिकरण का दोहरा चेहरा अब खुलकर सामने आ गया है। शहर में कई सौ करोड़ की जमीनों पर बिना ले-आउट पास कराए अवैध कॉलोनियां काटी जा रही हैं। आलीशान होटल और होम-स्टे तने जा रहे हैं। मीडिया में हो-हल्ला हुआ तो प्राधिकरण दिखावे के लिए बुलडोजर चला देता है। मगर उसी गाटा संख्या पर डिजिटल लॉक लगाने या सब-रजिस्ट्रार को सूचना देने से परहेज करता है। नतीजा, भू-माफिया अंदरूनी सेटिंग से उसी जमीन को टुकड़ों में बेचकर जेब भरते रहते हैं और भोली जनता ठगी जाती है।


दूसरी तरफ अयोध्या की 7-8 फीट की संकरी गलियों में पीढ़ियों से बसे गरीबों पर नियमों का पूरा पहाड़ तोड़ दिया जाता है।
नियम क्या कहते हैं और जमीनी हकीकत क्या है
उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 और भवन विकास नियमावली के मुताबिक नक्शा पास कराने के लिए सामने सड़क की चौड़ाई 9 से 12 मीटर यानी 30 से 40 फीट जरूरी है। पुराने घने इलाकों में भी यह 3 से 4.5 मीटर यानी 10 से 15 फीट से कम नहीं होनी चाहिए। साथ ही ओपन स्पेस और ग्राउंड कवरेज के कड़े मानक हैं।
अब सवाल यह है कि सदियों पुरानी गलियों में बसा गरीब रातों-रात सड़क 30 फीट चौड़ी कहां से करे? वह जब ईमानदारी से नक्शा अप्लाई करता है तो फाइलें महीनों दफ्तरों में धूल फांकती हैं। उधर सीमेंट, सरिया, मौरंग के दाम रोज बढ़ते हैं। थक-हारकर जब वह अपने ही प्लॉट पर काम शुरू करता है तो खेल शुरू होता है।
गृह-प्रवेश की खुशी बन जाती है मातम
जब तक मकान बनता है, सब शांत रहते हैं। गरीब कर्ज लेकर जैसे-तैसे छत पूरी करता है। गृह-प्रवेश के कुछ दिन बाद ही पता चलता है कि उसका गुपचुप चालान कट चुका है। हाथ में भारी जुर्माने की नोटिस थमा दी जाती है। सीलिंग और ध्वस्तीकरण की तलवार लटका दी जाती है। खुशियां मातम में बदल जाती हैं। फिर शुरू होता है कचहरी, अदालत और प्राधिकरण के चक्कर काटने का अंतहीन सिलसिला।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के भी उलट है कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में साफ कह चुका है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आवास का अधिकार मौलिक अधिकार है। ‘डी-फैक्टो रिकग्निशन’ सिद्धांत कहता है कि मास्टर प्लान या प्राधिकरण बनने से दशकों पहले बसे इलाकों पर नए बाय-लॉज थोपकर कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। मगर अयोध्या में अफसरशाही इन आदेशों को ठेंगा दिखा रही है।
सीएम की छवि पर लग रहा बट्टा
मुख्यमंत्री की जनहितैषी छवि को ये बेलगाम अफसर सीधे नुकसान पहुंचा रहे हैं। जनता में खामोशी से पनप रहा गुस्सा 2027 में बड़ा चुनावी नुकसान कर सकता है।
क्या हो समाधान
1 पुराने मोहल्लों और तंग गलियों के लिए ‘स्पेशल रिलैक्सेशन जोन’ बनाकर नक्शे के नियम सरल किए जाएं।
2 फाइल दबाकर बैठे बाबुओं पर सख्त कार्रवाई हो।
3 अवैध घोषित कॉलोनियों की रजिस्ट्री पर तुरंत रोक लगे और गाटा संख्या डिजिटली लॉक हो।
4 गरीबों के पहले से बने मकानों को नियमित करने की एकमुश्त योजना लाई जाए।
विकास की इमारत तभी बुलंद मानी जाएगी जब वह गरीब की झोपड़ी उजाड़कर न खड़ी की जाए। अगर समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने लगाम नहीं कसी तो अयोध्या की नाराजगी लखनऊ तक सुनाई देगी, और उसकी गूंज 2027 में साफ सुनाई पड़ सकती है।

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