
विद्यार्थियों के लिए आजकल शिक्षा प्राप्त करना मतलब व्यवस्था से युद्ध लड़ने जैसा होता जा रहा है। क्योंकि न उनके पढ़ने के लिए सभी स्कूल सुरक्षित हैं और न रहने के लिए हाॅस्टल। दिल्ली की घटना इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहां मई माह में एक बिल्डिंग गिरी थी और दूसरी अब सितम्बर माह में गिर गई। इन घटनाओं में कई अभिभावकों को अपनी सन्तानें खोनी पड़ी हैं। क्या इसका मतलब अभिभावक यह समझे कि उनकी सन्तान पढ़ लिखकर घर आ जाए तो जीत अन्यथा शिक्षा के लिए समझे शहीद ? हैरत तो तब होती है कि जब राजनीतिक पार्टियां व इनके नेता ऐसी घटनाओं से सीख लेकर सुधार करने के बजाय राजनीति शुरू कर देते हैं। भाजपा सरकार वाले इलाके में घटना हुई तो भाजपा जिम्मेदार और सपा वाले घेरना शुरू कर देते हैं। यदि यही घटना सपा की सरकार वाले क्षेत्र में हो जाती है तो भाजपा वाले विरोध शुरू कर देते हैं। यही रवैया अन्य दलों व उनके नेताओं का भी है। क्या जनता को इस तरह के मामलों से नेताओं की नीति को समझना नहीं चाहिए कि सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का रवैया एक जैसा ही होता है। यदि ऐसा नहीं है तो एक दूसरे को घेरने और विरोध करने के बजाय अपने-अपने क्षेत्र में व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर उदाहरण क्यों नहीं पेश करते हैं ? इसीलिए चर्चा है कि नेताओं को जनता के दुख दर्द से नही होती कोई पीर, अपनी राजनीति के लिए जनसेवक का आवरण ओढ़कर बनते हैं दिखावटी वीर
