विश्व की सबसे अमूल्य भंडार संस्कृत शास्त्रों में ही निहित हैं।- कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा।

रोहित सेठ

देवभाषा संस्कृत दुनियां की सभी भाषाओं की जननी है, विश्व की ज्ञान राशि का सबसे अमूल्य भंडार संस्कृत शास्त्रों में ही निहित हैं।अन्य भाषाओं को समृद्ध करना है तो संस्कृत के व्यापक अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था करनी होगी।
उक्त विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी एवं
महावीर धम्मविनय विश्वविद्यालय, यंगून,म्यांमार के बीच करार/समझौते (एमओयू) के विचार विमर्श हेतु संयुक्त रूप से बैठक के दौरान कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने व्यक्त किया।

कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि दोनों देशों के बीच शैक्षणिक समझौते से अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर संस्कृत और भारतीय संस्कृति को बढावा देने के लिए मील का पत्थर सिद्ध होगा।

व्याख्यान श्रृंखला, सांस्कृतिक और धार्मिक अध्ययन, संस्कृत और भारतीय ज्ञान प्रणाली के क्षेत्रों में अकादमिक आदान-प्रदान, केन्द्रीय पुस्तकालय, पुस्तकालय के बीच सहयोग के माध्यम से पुस्तकालय सुविधाओं और पाण्डुलिपि संसाधनों तक पहुंच, शोधकर्ताओं का आदान प्रदान, शिक्षण-स्टाफ और छात्र, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं का संचालन तथा शिक्षण सामग्रियों का आदान-प्रदान सहित विद्यार्थी अदला-बदली प्रोग्राम भी होगा।

उस दौरान इस संस्था के कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा के साथ महाविहार धम्मविनाय विश्वविद्यालय, यांगून, म्यांमार केंद्रीय प्रशासनिक बोर्ड के अध्यक्ष आशिष विज्जानंद, रजिस्ट्रार, आशिन डॉ. न्यावरा, प्रो-रेक्टर डॉ. हान विन,डाॅ ह्ला टुन उर्फ राम निवास – प्रोफेसर संस्कृत, नयन जाॅ – लेक्चरर, हिन्दी विभाग सहित इस संस्था से पद्मभूषण प्रो देवी प्रसाद द्विवेदी, कार्यवाहक कुलसचिव प्रो रामकिशोर त्रिपाठी, पाली विभाग के आचार्य प्रो रमेश प्रसाद, प्रो दिनेश कुमार गर्ग सहित म्यामांर के विद्यार्थियों ने भी सहभाग किया।

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