सशक्तिकरण की सफलता: मुस्लिम महिलाएं जीत की ओर अग्रसर

आसिफ रईस
बिजनौर


ऐसे देश में जहां सामाजिक मानदंड अक्सर व्यक्तिगत आकांक्षाओं पर भारी पड़ते हैं, भारत की सबसे कठिन परीक्षाओं को पास करने वाली मुस्लिम महिलाओं की सफलता की कहानियां आशा और प्रगति की किरण बनकर सामने आती हैं। यूपीएससी 2023 के नतीजों में वर्धा खान और साइमा सेराज अहमद जैसी कई मुस्लिम महिलाओं ने वह हासिल किया, जो कई लोग सपने देखते हैं, लेकिन कुछ ही हासिल कर पाते हैं। उनकी यात्राएँ न केवल व्यक्तिगत जीत को दर्शाती हैं, बल्कि दृढ़ता, कड़ी मेहनत और सरकार द्वारा सुनिश्चित समान अवसर के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक बाधाओं पर काबू पाने की व्यापक कहानी को भी दर्शाती हैं। उनकी सफलता पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और प्रतिगामी सांस्कृतिक बंधनों से बंधी हजारों मुस्लिम महिलाओं को आकांक्षाएं भी प्रदान करती है।

पूर्व कॉर्पोरेट पेशेवर वर्दा खान इस कथा का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। सार्वजनिक सेवा के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए 2021 में अपनी नौकरी छोड़ने के बाद, उन्हें शुरुआती असफलताओं का सामना करना पड़ा लेकिन अंततः अपने दूसरे प्रयास में 18वीं रैंक हासिल की। भारतीय विदेश सेवा के लिए वर्धा का चयन वैश्विक मंच पर देश के विकास में योगदान देने की उनकी इच्छा को रेखांकित करता है। इसी तरह, गिरिडीह से सिविल सेवक बनने तक नाज़िया परवीन की यात्रा उनके बचपन के सपने की निरंतर खोज से चिह्नित है। नाज़िया की अटूट प्रतिबद्धता ने उन्हें जामिया मिलिजा इस्लामिया की आवासीय कोचिंग अकादमी में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया, जहां वह अंततः 670वीं रैंक हासिल करके सफल रहीं। उनके पिता के प्रोत्साहन और यह एहसास कि उनकी कॉर्पोरेट नौकरी पूरी नहीं हो रही थी, ने उन्हें अपने सपने का पीछा करने के लिए प्रेरित किया, जिससे सफलता प्राप्त करने में परिवार के समर्थन और आत्म-जागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका प्रदर्शित हुई। एआईआर 165 हासिल करने वाले कोलकाता के खान साइमा सेराज अहमद भी इसी दृढ़ता को दर्शाते हैं। वह लचीलेपन के महत्व पर जोर देते हुए कहती हैं, “असफलताएं निराशाजनक हो सकती हैं लेकिन हम हमेशा आशावाद के साथ इसका मुकाबला कर सकते हैं। ये असफलताएं हमारी मानसिक शक्ति का निर्माण करती हैं। सजमा के शब्द इन सफल महिलाओं के बीच एक सामान्य सूत्र को दर्शाते हैं: असफलताओं को सीढ़ी के रूप में देखने की क्षमता रुकावटों की तुलना में इन महिलाओं की सफलताएँ अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि यूपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं। इस साल नौशीन, आरफा उस्मानी समेत कई मुस्लिम महिलाएं शामिल हुईं। फतीन जाहिद और अरीबा सगीर सहित अन्य ने परीक्षा उत्तीर्ण की है। उनकी उपलब्धियों का उनके समुदायों में जश्न मनाया जाता है, जो कई युवा उम्मीदवारों के लिए प्रेरणा का काम करती है। सरकारी प्रोत्साहनों और पहलों ने इन महिलाओं के लिए समान अवसर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। छात्रवृत्ति और कोचिंग सुविधाओं के साथ-साथ अल्पसंख्यक शिक्षा और सशक्तीकरण के उद्देश्य से कार्यक्रमों ने महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की है। ये उपाय, उम्मीदवारों के अथक प्रयासों के साथ संयुक्त हैं। स्वयं ने उनकी सफलता को सुगम बनाया है। इसके अलावा, इन महिलाओं की कहानियाँ सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से उबरने के लिए मुस्लिम महिलाओं द्वारा किए गए अतिरिक्त प्रयासों को रेखांकित करती हैं। स्थिर नौकरियों को छोड़ने से लेकर सफलता प्राप्त करने से पहले कई असफलताओं को सहने तक, उनकी यात्राएँ उनके लक्ष्यों के प्रति एक उल्लेखनीय समर्पण को उजागर करती हैं। वे इस बात के सशक्त उदाहरण के रूप में काम करते हैं कि जब सही अवसरों और समर्थन के साथ दृढ़ता मिलती है,

असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में मुस्लिम महिलाओं की सफलता में ऊपर की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति दर्शाती है कि कैसे सामाजिक और आर्थिक बाधाओं के बावजूद, व्यक्ति सही समर्थन और दृढ़ समर्पण के साथ महान ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं। ये कहानियाँ न केवल अन्य उम्मीदवारों को प्रेरित करती हैं, बल्कि सभी के लिए समान अवसर प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भविष्य में ऐसी कई सफलता की कहानियाँ सामने आएंगी और पितृसत्ता के बंधन टूटेंगे।

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सदा -ए -मोबीन ❤️✍️ दहेजऔरउसका_निवारण (रोकना)…दुनिया के सभी मुल्कों की तरक्की उसमें रहने बसने वाले इंसानों की तरक्की पर निर्भर करती है हर मुल्क में भिन्न-भिन्न जाति समूह के लोग पाए जाते हैं और सभी जातियों की अपनी अपनी संस्कृति और परंपरा होती है, आज के दौर में दहेज लगभग सभी जातियों में विद्यमान एक परंपरा है, आधुनिक दौर में उन सभी स्थापित परंपराओं को खत्म करना अति आवश्यक है जो एक प्रजातंत्रात्मक देश में समानता के सिद्धांत को प्रभावित करती हैं तथा समाज व देश की तरक्की में बाधक बनती हैं!दहेज प्रथा इसमें एक प्रमुख बाधा है इसे रोकने के लिए संसद ने 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम बनाया, अफसोस कि वह किताबों से निकलकर धरातल पर पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया यानी नागरिकों ने उस पर पूरी तरह से अमल नहीं किया!दहेज का मतलब किसी मूल्यवान प्रतिभूति से है यह हमारे समाज की एक अहम कुरीति के रूप में उभरती चली आ रही है, इस पे जिन पढ़े-लिखे, संपन्न और प्रतिष्ठित लोगों को रोक लगाना चाहिए वही इसका प्रदर्शन कर बढ़ावा दे रहे हैं, जिसका बुरा असर गरीबों पर पड़ता है उन्हें इससे मानसिक, भावनात्मक और असमानता जैसी प्रवृति का शिकार होना पड़ता है और अपनी लड़कियों को बोझ समझने लगते हैं!इसके कारण देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है, दहेज के कारण ही घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, आईपीसी 498 A, मारपीट, सीआरपीसी 125, तीन तलाक, आदि अपराध होते हैं, लोग अदालतों के चक्कर लगाकर हजारों रुपए व कीमती समय बर्बाद करते हैं और सरकारी मशीनरी के प्रयोग से देश पर आर्थिक बोझ पड़ता है!अगर सभी जातियों के पढ़े-लिखे, समाज व देश हित में सोचने वाले लोग इस प्रथा को खत्म करने के लिए अपने समाज से इस्लाही तहरीक (सुधार आंदोलन) शुरू कर दें तो यह पूरी तरह खत्म हो जाएगी!हमने अपने साथियों के साथ अपनी गद्दी (गाज़ी) बिरादरी से इस कुरीति को खत्म करने की तहरीक शुरू कर दी है!भारत के विभिन्न राज्यों में गद्दी बिरादरी के लोग रहते हैं हर क्षेत्र में किसी न किसी रूप में दहेज का चलन है हमारे समाज में अधिक दहेज की मांग करना, भारी-भरकम बारात ले जाना, तरह तरह का खाना बनवाना, बड़े-बड़े भौकाली लोगों को दावत देने को लोग अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं! हम किसी से कम नहीं की भावना में जीने वाले हमारे गद्दी भाइयों यह सोच हमारी बिरादरी, समाज और देश की तरक्की में बाधक है!और तो और बहुत से पढ़े-लिखे हमारे नौजवान साथी यह सोच बना लेते हैं कि पढ़ लिख कर जब हमें नौकरी मिल जाएगी तो किसी पैसे वाले परिवार से हमारा रिश्ता होगा खूब दहेज मिलेगा और बहुत हसीन बीवी, यानी पढ़े-लिखे और नौकरी पेशा लड़कों में दहेज की इच्छा चार गुना बढ़ जाती है, और लड़की वाले भी यह सोच बना लेते हैं कि लड़का नौकरी वाला या पैसे वाला ही हो दहेज चाहे जितना देना पड़ जाए, मेरे गद्दी भाइयों यह सोच गलत है क्योंकि लालच में किया गया निकाह गलत है!मेरे गद्दी भाइयों हमारा दीन इस्लाम है और हमारे आदर्श हजरत मोहम्मद स. हैं, हमें अपने दीन और अपने आदर्श के बताए हुए रास्ते पर चलना है!हुजूर से शादी हजरत बीबी खदीजा रजि. ने इसलिए नहीं किया था कि वह कोई सरकारी हाकिम है या बहुत बड़े व्यापारी या जमींदार या किसी सियासी ओहदे पर हैं, बल्कि इसलिए किया था कि उनके अख्लाक, आदत, किरदार, व्यवहार, ईमानदारी, सादगी और सच्चाई की कोई मिसाल नहीं!मेरे नौजवान साथियों धन, दौलत, पद, प्रतिष्ठा हासिल करो मगर इसकी वजह से निकाह में विलंब ना करो और यह मिल जाने पर दहेज का लालच ना करो, तुम्हारा पद, दौलत तो लोगों को ही पसंद आएगी, लेकिन उसके साथ सादगी पसंद नेक इंसान बनो जो खुदा को पसंद आएगा!हम अपने ऑल इंडिया गद्दी समाज फेडरेशन के सभी अविवाहित नौजवान साथियों से गुजारिश करते हैं कि संकल्प लो कि हम अपनी शादी में बिल्कुल दहेज नहीं लेंगे दोस्तों अगर तुम्हीं इस पर अमल नहीं करोगे तो बिरादरी इस पर अमल कैसे करेगी, हुजूर साहब हर बात पर पहले खुद प्रैक्टिकल करते थे तब समाज के लोग मानते थे लिहाजा आप लोग इस पर अमल करने की मेहरबानी करें, दोस्तों त्याग अल्लाह को बहुत पसंद है, दहेज का त्याग करो!बिहार,उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि के संगठन से जुड़े हमारे नौजवान साथी भी इस पर अमल करें और संकल्प लें!हुजूर ने अपनी बेटी की शादी में गृहस्ती की 9 चीजे दी थी और चंद खास लोगों को दावत दी थी,वो भी मेहर के पैस से!.. इस्लाम में बारात का भी कोई जिक्र नहीं है बारात को भी बाईकाट करें.. हम तो इसे लुटेरों का गैंग कहते हैं!हम लोग हुजूर की सुन्नत पर अमल करें निकाह में अपने चंद खास रिश्तेदारों व दोस्तों को ही ले जाएं ताकि लड़की वाले पर खाना देने का दबाव खत्म हो जाए!इस्लाम के मुताबिक निकाह में लड़की पक्ष का खर्च न के बराबर है वलीमा आदि लड़के वाले को करना चाहिए!मेरे गद्दी समाज के लोगों हमें अपने दीन पर मजबूती से अमल करना चाहिए, सुन्नत व हदीस के मुताबिक ही शादी करना चाहिए!