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एम डी न्यूज़ अलीगढ

दम घुटता देश, और मुद्दे भटकाती सियासत: यह कौन सा ‘अमृतकाल’ है?
आज देश की राजधानी गैस चैंबर बन चुकी है, लेकिन हमारे राष्ट्रीय विमर्श का दम किसी और ही प्रदूषण से घुट रहा है—प्राथमिकता के प्रदूषण से। अखबारों के पन्ने पलटिए, आपको हकीकत और प्रचार के बीच का जहरीला धुआँ साफ नज़र आएगा।
एक तरफ, ‘अमर उजाला’ जैसे अखबार मजबूरी को खबर बना रहे हैं—दिल्ली में 50% कर्मचारियों को घर से काम करना होगा। यह कोई प्रगतिशील कदम नहीं, बल्कि उस विफलता का स्वीकार है जिसने हमारी हवा को ज़हर बना दिया। ‘ग्रेप-3’ के सख्त कदम उठाना शासकों की “सक्रियता” नहीं, बल्कि बरसों से हो रहे अपराध को ढकने का एक लाचार प्रयास है। सवाल यह है: यह नौबत आई क्यों?
दूसरी तरफ, ‘नवोदय टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे प्रकाशनों का फोकस प्रदूषण के मूल कारण पर नहीं, बल्कि इसे उजागर करने वालों पर है। प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर कथित ‘मिर्च स्प्रे’ फेंकना या ‘यातायात बाधित’ करना अगर पहले पन्ने की लीड बन जाए, और उन्हें ‘नक्सल पोस्टर’ से जोड़ा जाए, तो साफ है कि यह सामान्य पत्रकारिता नहीं, बल्कि एजेंडा-चालित सेवा है। पुलिस पर हमले का औचित्य शून्य है, लेकिन जिस देश में छोटी सी दुर्घटना पर घंटों जाम रहने पर पुलिस निष्क्रिय रहती है, वहाँ प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों पर ‘यातायात बाधित’ करने का आरोप लगाकर कठोर कार्रवाई करना व्यवस्था की दुर्भावना को दर्शाता है। यह दिखाता है कि सत्ता के लिए समस्या प्रदूषण नहीं, बल्कि प्रदूषण पर सवाल उठाना है!
सबसे चौंकाने वाला मोड़ है पीएमओ की ‘सक्रियता’ की खबरें। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इसे लीड बनाया है—”दिल्ली का दम घुटा: पीएमओ ने वाहनों को चिन्हित किया।” क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि 10 साल से सत्ता में बैठी सरकार को देश की राजधानी की हवा ज़हरीली होने के बाद अचानक याद आता है कि “गाड़ियों का गैर-आनुपातिक भार” समस्या है? यह विफलता का प्रचार है, सक्रियता का नहीं। अगर वाहनों का घनत्व समस्या थी, तो मेट्रो का किराया कम रखने की अपील क्यों अनसुनी की गई?
यह कैसा राष्ट्रीय विमर्श है, जहाँ गंभीर स्वास्थ्य संकट को एक सरकारी आदेश या एक छिटपुट पुलिसिया कार्रवाई की सूचना से दबा दिया जाता है? जब लोग सचमुच सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब अखबारों की लीड अयोध्या दौरे या प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी बन रही है। ‘द टेलीग्राफ’ जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर, अधिकतर मीडिया का संपादकीय विवेक सत्ता के अनुकूल हो गया है।
हमारा दम घुट रहा है। दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब की हवा ज़हरीली है। यह किसी एक राज्य का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा है, जिसे केंद्र सरकार ने अनदेखी और अदूरदर्शिता से पाला है। आज ज़रूरत है कड़े और स्थायी समाधानों की—इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने, सार्वजनिक परिवहन को सस्ता करने और पराली जलाने जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर सख्ती बरतने की।
जब देश का नागरिक साफ हवा के लिए संघर्ष कर रहा हो, और खबरें प्रदर्शनकारियों पर हो रहे ‘मिर्च स्प्रे’ पर केंद्रित हों, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि असली प्रदूषण हवा में नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं में घुल चुका है।
“क्या यह मीडिया और सरकार मिलकर इस जानलेवा विफलता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही तय करने का साहस दिखाएंगे?”
