
*सहारा अख़बार का अचानक बंद होना उर्दू सहाफ़त के लिए नाक़ाबिल-ए-तलाफ़ी नुक़सान: डॉक्टर अम्मार रिज़वी**मआशरे की आवाज़ बनने वाली सहाफ़त का अचानक तअत्तुल*मोहम्मद सलमान जिला सहायक ब्यूरो प्रमुख बाराबंकी एम डी न्यूज बाराबंकी/लखनऊ ।उत्तर प्रदेश के साबिक़ कारगुज़ार वज़ीर-ए-आला और ऑल इंडिया माइनॉरिटीज़ फ़ोरम फ़ॉर डेमोक्रेसी के सदर डॉक्टर अम्मार रिज़वी ने रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा की अचानक इशाअत बंद होने पर गहरे रंज-ओ-अफ़सोस का इज़हार करते हुए कहा है कि यह उर्दू सहाफ़त के लिए एक ऐसा नुक़सान है जिसकी तलाफ़ी आसान नहीं।डॉक्टर अम्मार रिज़वी ने अपने बयान में कहा कि तक़रीबन तीन दशक से ज़्यादा अरसे तक मुसलसल शाए होने वाला रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा महज़ एक अख़बार नहीं था, बल्कि उर्दू सहाफ़त के वक़ार, संजीदगी और ज़िम्मेदाराना तर्ज़-ए-सहाफ़त की एक मज़बूत अलामत था। इस अख़बार का बंद होना उर्दू ज़बान, उर्दू सहाफ़त और उर्दूदाँ तबक़े के लिए एक बड़ा सदमा है।उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सहारा ने हमेशा मआशरे की आवाज़ को मज़बूती से बुलंद करने में अहम किरदार अदा किया। यह अख़बार दबे-कुचले, महरूम और नज़रअंदाज़ किए गए तबक़ात के मसाइल को जुर्रत, दयानतदारी और सच्चाई के साथ सामने लाता रहा। मुल्क और बैरून-ए-मुल्क की अहम ख़बरों से क़ारईन को बाक़बर रखना, हक़ायक़ पर मुबनी रिपोर्टिंग करना और अवामी मसाइल को तरजीह देना इसकी नुमायाँ पहचान रही है।डॉक्टर अम्मार रिज़वी ने मज़ीद कहा कि सियासत, खेल, अदब, इस्लामियात, ख़वातीन और समाजी मौज़ूआत पर मयारी और ख़ुसूसी मवाद शाए कर के राष्ट्रीय सहारा ने उर्दू क़ारईन के दिलों में अपनी एक मुनफ़रिद और मोअतबर पहचान क़ायम की थी। यही वजह है कि इसके बंद होने से उर्दू सहाफ़त के एक दरख़्शाँ दौर के इख़्तिताम का एहसास शिद्दत से हो रहा है।उन्होंने इस बात पर तशवीश का इज़हार किया कि अख़बार की अचानक बंदिश के नतीजे में सैकड़ों सहाफ़ी, ऑपरेटर और दीगर सहाफ़ती कारकुन बेरोज़गार हो गए हैं, जबकि वे अफ़राद भी मुतास्सिर हुए हैं जो पहले ही रोज़गार से महरूम थे। यह सूरत-ए-हाल न सिर्फ़ मुतास्सिरा ख़ानदानों के लिए बल्कि मज़मूई तौर पर उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल के लिए भी फ़िक्रमंदी का बाइस है।डॉक्टर अम्मार रिज़वी ने हुकूमत-ए-हिंद और हुकूमत-ए-उत्तर प्रदेश से अपील की कि वे उन तमाम सहाफ़ियों और कारकुनों के लिए फ़ौरी, मोअस्सिर और मुनासिब माली और समाजी इमदाद के इक़दामात करें, ताकि इस मुश्किल वक़्त में उन्हें सहारा मिल सके और उनका मुस्तक़बिल महफ़ूज़ रह सके।इसके साथ ही उन्होंने उर्दू नेशनल जर्नलिस्ट ट्रस्ट के क़याम की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि इस तरह के एक मुनज़्ज़म और ग़ैर-सियासी ट्रस्ट के ज़रिये बेरोज़गार सहाफ़ियों को वक़्ती मदद फ़राहम की जा सकती है, जो आगे चल कर उनके लिए मुस्तक़िल सहारा बनेगी और उर्दू सहाफ़त को मज़बूत बुनियाद फ़राहम करेगी।डॉक्टर अम्मार रिज़वी ने सहारा ग्रुप के बानी सुबरत राय को ख़राज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि उन्होंने उर्दू और अक़लियती तबक़ात की आवाज़ को क़ौमी सतह पर पहुँचाने के लिए एक मज़बूत प्लेटफ़ॉर्म फ़राहम किया। साथ ही उन्होंने ग्रुप एडिटर अब्दुल माजिद निज़ामी की इदारत, सहाफ़ती बसीरत और वक़ार को भी सराहा।उन्होंने कहा कि रोज़नामा सहारा के बंद होने से जो ख़ला पैदा हुआ है, उसे पुर करने की ज़िम्मेदारी अब इंक़िलाब, सहाफ़त, आग, अवध नामा, क़ौमी तंज़ीम, क़ौमी ख़बरें, लोहिया नामा, समाज न्यूज़, क़ौमी भारत, तासीर, ज़मीनी सच, जम्हूरियत टाइम्स, श्रीनगर जंग, वरक़-ए-ताज़ा, अल हयात, सालार, क़ौमी सहाफ़त, फ़ज्र ख़बर, रौशनी, हमारी आवाज़, मिसाइल एक्सप्रेस, उर्दू एक्शन, क़ौमी मीज़ान, सच की आवाज़, शान ए सिद्धार्थ, आलमी दरपन जैसे दीगर उर्दू अख़बारात पर आयद होती है। हमें उम्मीद है कि ये अख़बारात इस ख़ला को पुर करने में मोअस्सिर किरदार अदा करेंगे और मआशरे की आवाज़ को पूरी क़ुव्वत के साथ बुलंद करते रहेंगे।आख़िर में डॉक्टर रिज़वी ने कहा कि उर्दू सहाफ़त सिर्फ़ इज़हार का ज़रिया नहीं, बल्कि तहज़ीब, शऊर और हज़ारों ख़ानदानों के रोज़गार का सहारा भी है, इसलिए इसकी बक़ा और मज़बूती हम सब की मुश्तरका ज़िम्मेदारी है।यह इत्तिला ऑल इंडिया माइनॉरिटीज़ फ़ोरम फ़ॉर डेमोक्रेसी के शोबा-ए-नशर-ओ-इशाअत के सेक्रेटरी अबूशहमा अंसारी ने फ़राहम की।
