
सर्वकालिक साहित्यकार हैं मोहन राकेश।
डॉ. राजेन्द्र उपाध्याय जी को श्रद्धांजलि।
वाराणसी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर मोहन राकेश की रचनाएं उन्हें सर्वकालिक साहित्यकार की श्रेणी में स्थापित करती हैं। प्रागैतिहासिक काल हो अथवा वर्तमान, सभी कालखंड में उनका सामयिक लेखन न केवल साहित्य को नई दिशा प्रदान करता है, बल्कि समाज को भी आईना दिखाने का काम करता है। आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे जैसी नाट्य कृतियां हों या कहानी उपन्यास। उनकी सभी रचनाओं में समाज का प्रतिबिंब झलकता है। नारी विमर्श को भी मोहन राकेश ने विशेषता और पूर्णता के साथ व्याख्यायित किया है। यह बातें नगर की अग्रणी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था “कामायनी वाराणसी” द्वारा आयोजित “बतरस” के तृतीय संस्करण में रविवार, 11 जनवरी को कामायनी कार्यालय में कही गईं। नगर के साहित्य, संस्कृति, कला प्रेमियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति ने कार्यक्रम को अविस्मरणीय बना दिया। कार्यक्रम के संचालक आशुतोष शास्त्री के मंगलाचरण और कामायनी वाराणसी के अध्यक्ष डॉ. दीपक कुमार के स्वागत संबोधन के साथ आरंभ हुए बतरस के तृतीय संस्करण में सर्वप्रथम गत दिनों दिवंगत हुए देश के सुप्रसिद्ध नाटककार एवं कामायनी वाराणसी के आजीवन मानद सदस्य डॉ. राजेंद्र उपाध्याय को मौन श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और नाट्य कौशल का स्मरण किया गया। इस अवसर पर देश के द्वितीय प्रधानमंत्री भारतरत्न लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि, मोहन राकेश की जन्म शताब्दी और स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती की पूर्व संध्या पर उन महापुरूषों का स्मरण किया गया। मोहन राकेश के संदर्भ में आयोजित “बतरस” के प्रयोजन के अनुरूप मोहन राकेश के जीवन दर्शन और साहित्य सृजन की सार्थकता के परिप्रेक्ष्य में नाट्याभिनय, कहानी पाठ, नाट्य पाठ एवं गीत सहित उनके सिनेमाई योगदान की भी चर्चा की गई। अंडे के छिलके या गिरगिट का सपना जैसी मज़ेदार कहानियां हों, कालिदास, विलोम, मातुल या सावित्री जैसे किरदार हों, सभी को एक के बाद एक करके आज के कार्यक्रम में जीवंत किया गया। कार्यक्रम में डॉ. दीपक कुमार, वीणा सहाय, दिनेश श्रीवास्तव, डॉ. रजनी अग्रवाल, अमलेश श्रीवास्तव, सुश्री शुभ्रा वर्मा, अरुण जैन, श्री बालमुकुंद त्रिपाठी, अनूप अग्रवाल, डॉ. सुशांत शर्मा, अमन श्रीवास्तव, मनोरमा शर्मा, सुश्री मानसी रावत, सुमित ठाकुर, श्रीमती कामना चतुर्वेदी, जगदीश केशरी इत्यादि ने प्रभावशाली प्रस्तुतियों से आकर्षण बनाए रखा। श्रीमती सरिता लखोटिया, श्री शंकर रवि, श्री आर्यप्रिय गंगाजल, श्री अविनाश पाण्डेय, श्री शिव कुमार अग्रवाल, श्री संदीप मौर्य, श्री अजीत कुमार, श्री आयूष सिंह एवं अनेक कलाप्रेमी दर्शकों उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही। अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. दीपक कुमार ने बतरस की व्याख्या करते हुए बताया कि किसी विधासह कार्यक्रम में जो एकरसता बन जाती है, उसके स्थान पर एक ही विषय संदर्भ के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न सांस्कृतिक एवं साहित्यिक माध्यमों का प्रयोग कार्यक्रम को आकर्षक बनाता है। बतरस का अगला संस्करण आगामी 22 फरवरी (रविवार) को ऋतुराज “बसंत” के संदर्भ में आयोजित होगा।
