स्वाँग और भगत : उत्तर भारत के सांगीतिक नाट्य” विषय पर विशिष्ट व्याख्यान।

वाराणसी आज 16 जनवरी 2026 को अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र एवं मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में “स्वाँग और भगत : उत्तर भारत के सांगीतिक नाट्य” विषय पर विशिष्ट व्याख्यान माला का आयोजन हुआ, जिसके मुख्य वक्ता कैलिफ़ोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में संप्रेषण और प्रदर्शन विभाग के प्रोफेसर देवेन्द्र शर्मा रहे। यह व्याख्यान उत्तर भारत की लोकनाट्य परंपरा—विशेषतः स्वांग, भगत, नौटंकी और संगीत—के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा सामुदायिक स्वरूप पर केंद्रित था। व्याख्यान का मूल उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि ये लोकनाट्य विधाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक मूल्यों की संरचना में इनकी निर्णायक भूमिका रही है।
प्रोफेसर शर्मा ने अपने वक्तव्य में बताया कि अठारहवीं शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक उत्तर भारत के नगरों और कस्बों के लगभग हर बड़े मोहल्ले में नौटंकी अखाड़ों की सशक्त उपस्थिति थी। ये अखाड़े केवल नाट्य मंडलियाँ नहीं थे, बल्कि समुदाय की सामूहिक चेतना और प्रतिष्ठा के केंद्र थे। विभिन्न अखाड़ों के बीच एक प्रकार की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी, जो अभिनय-कौशल, कथा-विन्यास, संवाद-शैली, संगीत, वेशभूषा और मंच-सज्जा जैसे तत्वों पर आधारित होती थी। इस पूरी प्रक्रिया में कलाकारों के साथ-साथ समाज के अन्य वर्गों की सक्रिय सहभागिता होती थी। श्रम, धन, समय और संसाधनों का निवेश केवल कलाकारों द्वारा नहीं, बल्कि पूरे समुदाय द्वारा किया जाता था। उल्लेखनीय तथ्य यह था कि उस समय रंगमंच से जुड़ा कोई भी कार्य बाहरी स्रोतों को नहीं सौंपा जाता था; सब कुछ समुदाय के भीतर रहकर ही संपन्न होता था, यहाँ तक कि दर्शक भी इस सांस्कृतिक प्रक्रिया के सहभागी माने जाते थे।
व्याख्यान में नाट्यशास्त्र के संदर्भ से यह स्पष्ट किया गया कि भारतीय रंगमंच में संगीत की भूमिका केंद्रीय रही है। नाट्यशास्त्र के अनुसार पाठ्य का संबंध ऋग्वेद से, गीत का सामवेद से, अभिनय का यजुर्वेद से तथा रस का अथर्ववेद से माना गया है। इस प्रकार नाट्यवेद की संकल्पना वेदों से जुड़ी एक समग्र सांस्कृतिक प्रणाली के रूप में सामने आती है, जिसमें संगीत, अभिनय और भावानुभूति का गहरा अंतर्संबंध है। स्वांग और भगत जैसी लोकनाट्य विधाओं में यह समन्वय अत्यंत सजीव रूप में दिखाई देता है। स्लाइड्स के माध्यम से नाटक और प्रकरण के भेद को भी स्पष्ट किया गया। नाटक उन कथाओं पर आधारित होते हैं जिनके नायक उदात्त चरित्र के होते हैं और जिनकी कथा पहले से प्रसिद्ध होती है। स्वांग-भगत परंपरा में हरिश्चंद्र, गोपीचंद, भरतरी, पुराणमल, ध्रुव, श्रीकृष्ण और गुरु गोरखनाथ जैसे पात्र इसी श्रेणी में आते हैं। इसके विपरीत प्रकरण वे नाट्य रूप होते हैं, जिनकी कथा लेखक की मौलिक कल्पना या समकालीन सामाजिक समस्याओं पर आधारित होती है। स्वांग-भगत परंपरा के अनेक नाट्य रूप प्रकरण की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि वे अपने समय के सामाजिक प्रश्नों—जैसे दहेज, लालच, नैतिक पतन और साम्प्रदायिक सौहार्द—को केंद्र में रखते हैं। इस संदर्भ में ‘श्रीमती मंजरी’, ‘बहन-भाईया’ और ‘बेटी का ब्याह’ जैसे नाटकों का उल्लेख किया गया, जो समाज-सुधार की चेतना से प्रेरित रहे हैं। प्रोफेसर शर्मा ने यह भी बताया कि प्रारंभिक स्वांग और भगत परंपरा में भक्ति और आध्यात्मिक चेतना की प्रमुख भूमिका थी, जिसे डिवोशनल थिंकिंग के रूप में देखा जा सकता है। समय के साथ इन लोकनाट्य रूपों में व्यावसायिक रंगमंच के तत्व जुड़े और प्रस्तुतियाँ अधिक संगठित तथा संरचित होती चली गईं। पहले जहाँ स्वांग पूरी रात तक चलते थे, वहीं बाद के दौर में समय-सीमा और प्रस्तुति की शैली में परिवर्तन आया। कई कलाकार दशकों तक एक ही भूमिका निभाते रहे, जिससे चरित्र और कलाकार के बीच गहरा भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित हुआ। व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामुदायिक सहभागिता पर केंद्रित था। प्रोफेसर शर्मा ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक लोकनाट्य में समुदाय केवल दर्शक नहीं, बल्कि रचनात्मक प्रक्रिया का अभिन्न अंग था। रंगमंच की भाषा और बोली जनता की अपनी थी, जिससे कला और समाज के बीच दूरी नहीं बनती थी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज के समय में प्रयोग और नवाचार आवश्यक हैं, लेकिन प्रयोग से पहले परंपरा और लोकबोध का सम्मान अनिवार्य है। यह विचार आधुनिक रंगमंच के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिशा-सूचक सिद्ध हो सकता है। समग्र रूप से यह व्याख्यान उत्तर भारत की लोकनाट्य परंपरा को एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें संगीत, नाटक, समाज और सामुदायिक जीवन का गहरा समन्वय दिखाई देता है। स्वांग, भगत और नौटंकी जैसी विधाएँ हमें यह समझने में सहायता करती हैं कि भारतीय रंगमंच की जड़ें केवल मंच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज की सामूहिक स्मृति, नैतिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान में गहराई से रची-बसी हुई हैं। आज के इस विशिष्ट व्याख्यान में हम प्रो. देवेंद्र शर्मा का हार्दिक स्वागत करते हैं। इस दौरान अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. राजकुमार व मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम संचालन प्रतीक्षा ने किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रो. अर्चना कुमार, प्रो. आशीष त्रिपाठी एवं शोधार्थीगण रंजीत, रिमी, कंचन, चन्दन,ललित, देव व्रत, अंबिका नंदन, विभव समेत विभिन्न संकायों के विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *