महराजगंज।एक ओर पूरा देश होली के रंग में सराबोर है, लोग गले मिलकर प्रेम और सौहार्द का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला आबकारी कार्यालय में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सम्मान को तार-तार करने वाली एक घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

होली मिलन के उपलक्ष्य में जब एक स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार राकेश त्रिपाठी जिला आबकारी अधिकारी के कार्यालय पहुंचे, तो उनका स्वागत रंग-गुलाल से नहीं, बल्कि कटाक्ष और तंज से किया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही वे अपनी गाड़ी से उतरे, आबकारी निरीक्षक (निचलौल) वैभव यादव, आबकारी निरीक्षक (सदर) गिरीश कुमार और कार्यालय के बड़े बाबू ने उन्हें घेर लिया।

बताया जाता है कि वैभव यादव ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा,
“आप हमारी खबरें बड़े मन से छापते हैं और कमिश्नर साहब को टैग भी करते हैं।”इसके बाद उन्होंने अपनी फटी हुई शर्ट की आस्तीन दिखाते हुए कथित तौर पर चुनौती दी,
“आज मेरी शर्ट फटी हुई है, इसे भी अखबार में छाप दीजिएगा और हमारे कमिश्नर साहब को टैग कर दीजिएगा।”यह कथन केवल एक तंज नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक माना जा रहा है जो व्यवस्था की खामियों को उजागर करने वालों को असहज करने का प्रयास करती है।

मामला यहीं नहीं रुका। आबकारी निरीक्षक (सदर) गिरीश कुमार ने भी पत्रकार का उपहास उड़ाया। सवाल यह है कि क्या विभाग अपनी कमियों को सुधारने के बजाय उन्हें उजागर करने वालों को निशाना बनाना आसान समझता है?

लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम सत्ता और प्रशासन को आईना दिखाना है, न कि उनके तानों और उपहास का शिकार बनना। यदि सच्चाई लिखना ही अपराध मान लिया जाए, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाएगा?

घटना के बाद स्थानीय पत्रकारों में भारी रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि यदि अधिकारी इसी तरह सामंती अंदाज़ में व्यवहार करेंगे, तो निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करना कठिन हो जाएगा।

होली जैसे पावन पर्व पर इस तरह की ‘ओछी’ हरकत न केवल व्यक्तिगत अपमान है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी प्रहार है।

अब बड़ा सवाल यह है —
क्या सच लिखना गुनाह है?
और क्या “फटी शर्ट” के पीछे छिपाकर सवालों की आवाज को दबाया जा सकता है?

प्रशासन को चाहिए कि मामले का तत्काल संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे, ताकि यह संदेश जाए कि पत्रकारिता का सम्मान सर्वोपरि है और सच को तानों से नहीं दबाया जा सकता।

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