संथाल परगना, जिला दुमका। झारखंड की उपराजधानी संथाल परगना के दुमका जिला में स्थित बासुकीनाथ धाम एक प्राचीन और प्रसिद्ध शिव मंदिर है। जिसे “फौजदारी बाबा” के दरबार के नाम से भी जाना जाता है। देवघर से बासुकीनाथ धाम की दूरी 45 कि.मी. है। इस मंदिर की ऐसी मान्यता है कि, समुद्र मंथन में प्रयुक्त बासुकी नाग यहां शिव की पूजा की थी।


पौराणिक मान्यता एवं स्थानीय लोगों के अनुसार, बासुकीनाथ धाम का इतिहास समुद्र मंथन से जुड़ा है, ऐसी मान्यता है कि मंदिर के गर्भ गृह में नाग वासुकी ने शिव की पूजा की थी, जिसके बाद से इसे बासुकीनाथ कहा जाने लगा।
प्रचलित लोक कथा के अनुसार, “बासु” नामक एक स्थानीय आदिवासी किसान को खुदाई के दौरान शिवलिंग मिला, इसके बाद इस मंदिर का निर्माण “बासुकी तत्मे नामक एक आदिवासी के द्वारा कराया गया था।
यहां के मंदिर परिसर में भगवान शिव और माता पार्वती के मंदिर आमने-सामने हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि बाबा शिव, भक्तों की फरियाद जल्द सुनते हैं और न्याय करते हैं, इसी मान्यताओं के साथ बासुकी धाम को “फौजदारी बाबा” भी कहा जाता है।
यह एक प्राचीन सामूहिक मंदिर है, जिसमें मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे-छोटे मंदिर भी हैं।
यह भी माना जाता है कि बैद्यनाथ धाम ( देवघर ) की यात्रा तब तक अधूरी है, जब तक बासुकी नाथ में जलार्पण ना किया जाए। यह स्थान सालों भर एवं खासकर श्रावण मास में लाखों कावड़ियों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। श्रावण मास में शिव भक्त बिहार के भागलपुर जिला के सुल्तानगंज के उत्तर वाहिनी गंगा में स्नान कर गंगा के बीचों-बीच स्थित सर्वप्रथम “अजगैबी नाथ मंदिर में जलार्पण कर गंगा से जल भर कर कावड़ यात्रा प्रारंभ करते हुए बैद्यनाथ धाम में जलार्पण करने के बाद बाबा बासुकीनाथ धाम में जलार्पण से यात्रा समाप्त करते हैं।
इस दौरान कांवडी़यों को बिहार के सुल्तानगंज से बासुकी नाथ धाम की 150 से 155 कि.मी. की यात्रा तय करने में 5- 6 दिन लग जाता है, जो की सबसे लंबी कावड़ यात्रा मानी जाती है।
यहां बासुकीनाथ धाम रेलवे स्टेशन भी है एवं देवघर दुमका सड़क मार्ग से भी जाया जा सकता है।

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