
रिपोर्ट ज़ुबैर अहमद
md news बहुआयामी समाचार
प्रयागराज किसी गरीब पिता का बेटा जब कानून की पढ़ाई पूरी करके काला कोट पहनने का सपना देखता है, तो उस सपने के पीछे केवल उसकी मेहनत नहीं, बल्कि पूरे परिवार का संघर्ष, माता-पिता का त्याग और बेहतर भविष्य की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। लेकिन यदि वकालत के पेशे में प्रवेश करने के बाद भी युवा अधिवक्ताओं को लगातार नई प्रक्रियाओं और आर्थिक बोझ का सामना करना पड़े, तो उनके भविष्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर इलाहाबाद जन कल्याण समिति के अध्यक्ष मोहम्मद हन्जला ने आवाज बुलंद की है।
वरिष्ठ समाज सेवी मोहम्मद हन्जला अध्यक्ष इलाहबाद जन कल्याण समिति ने ADM सिटी, प्रयागराज के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति एवं बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष को ज्ञापन भेजकर वकालत के पेशे में लागू तथा प्रस्तावित अतिरिक्त प्रक्रियाओं पर पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से COP (Certificate of Practice) की अनिवार्य प्रक्रिया समाप्त करने और नए अधिवक्ताओं के लिए प्रस्तावित छह माह की अनिवार्य इंटर्नशिप को वापस लेने की मांग उठाई है।
वकालत का सपना आर्थिक मजबूरी की भेंट न चढ़े
मोहम्मद हन्जला ने कहा कि वकालत केवल रोजी-रोटी कमाने का जरिया नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला सम्मानित पेशा है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के हजारों युवा कठिन परिस्थितियों में कानून की पढ़ाई पूरी करते हैं। कोई पिता अपनी जमीन बेचकर बेटे को पढ़ाता है, कोई मां अपने गहने गिरवी रखकर उसकी फीस भरती है, तो कोई परिवार वर्षों तक अपनी जरूरतों को कुर्बान करता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक युवा कानून की पढ़ाई पूरी कर आवश्यक शैक्षणिक और वैधानिक योग्यताएं हासिल कर लेता है, तो उसके पेशेवर जीवन की शुरुआत को अतिरिक्त आर्थिक और प्रक्रियागत बोझ से क्यों कठिन बनाया जाए?
COP और छह माह की अनिवार्य इंटर्नशिप पर उठाए गंभीर सवाल
ज्ञापन में मोहम्मद हन्जला ने मांग की कि:
- COP (Certificate of Practice) की अनिवार्य प्रक्रिया समाप्त करने की पहल की जाए।
- नए अधिवक्ताओं के लिए प्रस्तावित छह माह की अनिवार्य इंटर्नशिप को समाप्त करने पर पुनर्विचार किया जाए।
- वकालत शुरू करने में बाधा बनने वाली अनावश्यक अतिरिक्त औपचारिकताओं को वापस लिया जाए।
- अधिवक्ताओं के पंजीकरण और पेशे में प्रवेश की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और कम खर्चीली बनाई जाए।
- किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले युवा अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाए।
- राष्ट्रपति संबंधित सक्षम विधिक संस्थाओं का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित कर युवा अधिवक्ताओं के हित में आवश्यक पहल करें।
यह लड़ाई किसी एक अधिवक्ता की नहीं, हजारों युवाओं के भविष्य की है
मोहम्मद हन्जला ने कहा कि उनकी आवाज किसी एक व्यक्ति या संगठन तक सीमित नहीं है। यह उन युवाओं की आवाज है, जो आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में खड़े होने का सपना देखते हैं। वकालत में प्रशिक्षण, अनुशासन और योग्यता का महत्व अपनी जगह है, लेकिन ऐसी व्यवस्थाओं पर भी विचार होना चाहिए जो आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए अतिरिक्त बाधा बन सकती हैं।
भावुक अपील—काला कोट अमीरों की विरासत नहीं
भावुक अंदाज में मोहम्मद हन्जला ने कहा
“किसी गरीब मां का बेटा जब काला कोट पहनने का सपना देखता है, तो उसकी आंखों में केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। वह भी चाहता है कि एक दिन न्यायालय में खड़ा होकर किसी गरीब, मजलूम और बेसहारा इंसान को न्याय दिलाए। क्या उसका सपना केवल इसलिए अधूरा रह जाए कि उसके परिवार के पास अतिरिक्त प्रक्रियाओं और खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है? काला कोट किसी अमीर परिवार की विरासत नहीं, बल्कि हर योग्य युवा का सपना है।”
राष्ट्रपति, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से निर्णायक पहल की मांग
मोहम्मद हन्जला ने महामहिम राष्ट्रपति, बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से अपील की कि युवा अधिवक्ताओं की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए। उन्होंने कहा कि अधिवक्ताओं को मजबूत बनाने का अर्थ न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाना है। यदि प्रतिभाशाली युवाओं को शुरुआत में ही आर्थिक और प्रक्रियागत कठिनाइयों से जूझना पड़ेगा, तो उनके पेशेवर विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि इस विषय पर व्यापक चर्चा और युवा अधिवक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लिया जाना चाहिए।
मोहम्मद हन्जला का स्पष्ट संदेश है—“वकालत को महंगा नहीं, आसान बनाइए। काला कोट पहनने का सपना देखने वाले गरीब के बेटे के रास्ते में आर्थिक और अनावश्यक प्रक्रियागत दीवारें खड़ी मत कीजिए। न्याय के मंदिर तक पहुंचने का अवसर हर योग्य युवा को मिलना चाहिए।”
प्रकाशन के लिए विशेष शीर्षक: “काला कोट के सपने को महंगी प्रक्रियाओं से बचाने की मुहिम: मोहम्मद हन्जला ने राष्ट्रपति तक पहुंचाई युवा अधिवक्ताओं की आवाज़”
पूरे भारत में पहली बार मोहम्मद हन्जला ने उठाया इस मुद्दे को. कई समाचार पत्रों का कहना है की हन्जला उत्तर प्रदेश . एवं भारत के हर सामाजिक मुद्दे को प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति एवं मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का कार्य करते हैं और सामाजिक मुद्दे के लिए हमेशा लड़ते रहते हैं.
