आवास विकास स्थित राजकीय महाविद्यालय बदायूं में महिला प्रकोष्ठ के तत्वावधान में नारी सशक्तिकरण हेतु संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार विषय पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि शासकीय अधिवक्ता मदन लाल राजपूत एवं राजवीर सिंह यादव एडवोकेट ने सरस्वती प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। अतिथियों का स्वागत इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ संजय कुमार ने किया।
मुख्य अतिथि ने कहा कि स्त्री हो या पुरुष कानून के समक्ष सभी समान है। दुनिया की सभी महिलाएं हमारी माता बहने हैं इस दृष्टि से प्रत्येक परिवार में संस्कार को विकसित कर नारी को समाज में सम्मानित स्थान दिया जा सकता है। एडवोकेट राजपूत ने कहा कि नारी सशक्तिकरण के लिए शहर की अपेक्षा ग्रामीण परिवेश में जीवन यापन करने वाली गृहणियों को सशक्त करने और उनके अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथि राजवीर सिंह यादव ने कहा कि जो कार्य कानून या सत्ता के द्वारा संभव नहीं होता वह एक संस्कारित समाज के द्वारा संभव होता है। कोई भी कानून सामाजिक विकृतियों को जड़ से समाप्त नहीं कर पाता है। उसके लिए शिक्षित समाज के द्वारा अच्छे विचार उतपन्न होना और उसके क्रियान्वयन आवश्यकता है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता डॉ राकेश कुमार जायसवाल ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रथम शिक्षक उसकी मां होती है। नारी सिर्फ जननी ही नहीं अपितु चलती फिरती संस्कारशाला और पाठशाला है।
कार्यशाला में छात्राओं की भाषण प्रतियोगिता भी आयोजित हुई, जिसमें प्रथम स्थान बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा तान्या सक्सेना को प्राप्त हुआ। दूसरे स्थान पर संयुक्त रुप से दिव्या राजपूत और सुंदरम श्रीवास्तव रहीं। तीसरा स्थान संयुक्त रूप से गीतांजलि सिंह एवं जैनब को प्राप्त हुआ। विजेता प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि ने पुरस्कृत किया। महिला प्रकोष्ठ के द्वारा पूर्व में आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता के विजेता प्रतिभागी संजना चौहान, सत्यम दीक्षित एवं बबीता देवी को प्रथम द्वितीय तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ श्रद्धा गुप्ता एवं डॉ डाली ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किया।

निर्णायक की भूमिका डॉ डाली,डॉ सरिता यादव एवं डॉ ज्योति विश्नोई ने निभाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कार्यवाहक प्राचार्य डॉ अंशु सत्यार्थी एवं डॉ श्रद्धा गुप्ता ने संयुक्त रूप से किया।प्रतियोगिता में कुल 14 छात्राओं ने प्रतिभाग किया। जिसमें पिंकी गुप्ता,भूमि मिश्रा,सविता यादव, संजना सिंह, सौम्या पाठक,प्रतीक्षा तिवारी,मिरसी सागर एवं शिवानी के विचार सराहे गए।
इस अवसर पर डॉ मिथिलेश कुमार, डॉ राजधारी यादव,बलराम यादव, अनुज प्रताप सिंह,एकता सक्सेना, पायल,दीक्षा सक्सेना, प्रिंस सक्सेना, अर्जुन सिंह, सेजल मिश्रा, स्नेहा पांडे, रिंकू कश्यप,वीर बहादुर एवं गौरव पाली आदि ने सहयोग प्रदान किया।

✍️ ब्यूरो रिपोर्ट: आलोक मालपाणी बदायूं ✍️

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सदा -ए -मोबीन ❤️✍️ दहेजऔरउसका_निवारण (रोकना)…दुनिया के सभी मुल्कों की तरक्की उसमें रहने बसने वाले इंसानों की तरक्की पर निर्भर करती है हर मुल्क में भिन्न-भिन्न जाति समूह के लोग पाए जाते हैं और सभी जातियों की अपनी अपनी संस्कृति और परंपरा होती है, आज के दौर में दहेज लगभग सभी जातियों में विद्यमान एक परंपरा है, आधुनिक दौर में उन सभी स्थापित परंपराओं को खत्म करना अति आवश्यक है जो एक प्रजातंत्रात्मक देश में समानता के सिद्धांत को प्रभावित करती हैं तथा समाज व देश की तरक्की में बाधक बनती हैं!दहेज प्रथा इसमें एक प्रमुख बाधा है इसे रोकने के लिए संसद ने 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम बनाया, अफसोस कि वह किताबों से निकलकर धरातल पर पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया यानी नागरिकों ने उस पर पूरी तरह से अमल नहीं किया!दहेज का मतलब किसी मूल्यवान प्रतिभूति से है यह हमारे समाज की एक अहम कुरीति के रूप में उभरती चली आ रही है, इस पे जिन पढ़े-लिखे, संपन्न और प्रतिष्ठित लोगों को रोक लगाना चाहिए वही इसका प्रदर्शन कर बढ़ावा दे रहे हैं, जिसका बुरा असर गरीबों पर पड़ता है उन्हें इससे मानसिक, भावनात्मक और असमानता जैसी प्रवृति का शिकार होना पड़ता है और अपनी लड़कियों को बोझ समझने लगते हैं!इसके कारण देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है, दहेज के कारण ही घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, आईपीसी 498 A, मारपीट, सीआरपीसी 125, तीन तलाक, आदि अपराध होते हैं, लोग अदालतों के चक्कर लगाकर हजारों रुपए व कीमती समय बर्बाद करते हैं और सरकारी मशीनरी के प्रयोग से देश पर आर्थिक बोझ पड़ता है!अगर सभी जातियों के पढ़े-लिखे, समाज व देश हित में सोचने वाले लोग इस प्रथा को खत्म करने के लिए अपने समाज से इस्लाही तहरीक (सुधार आंदोलन) शुरू कर दें तो यह पूरी तरह खत्म हो जाएगी!हमने अपने साथियों के साथ अपनी गद्दी (गाज़ी) बिरादरी से इस कुरीति को खत्म करने की तहरीक शुरू कर दी है!भारत के विभिन्न राज्यों में गद्दी बिरादरी के लोग रहते हैं हर क्षेत्र में किसी न किसी रूप में दहेज का चलन है हमारे समाज में अधिक दहेज की मांग करना, भारी-भरकम बारात ले जाना, तरह तरह का खाना बनवाना, बड़े-बड़े भौकाली लोगों को दावत देने को लोग अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं! हम किसी से कम नहीं की भावना में जीने वाले हमारे गद्दी भाइयों यह सोच हमारी बिरादरी, समाज और देश की तरक्की में बाधक है!और तो और बहुत से पढ़े-लिखे हमारे नौजवान साथी यह सोच बना लेते हैं कि पढ़ लिख कर जब हमें नौकरी मिल जाएगी तो किसी पैसे वाले परिवार से हमारा रिश्ता होगा खूब दहेज मिलेगा और बहुत हसीन बीवी, यानी पढ़े-लिखे और नौकरी पेशा लड़कों में दहेज की इच्छा चार गुना बढ़ जाती है, और लड़की वाले भी यह सोच बना लेते हैं कि लड़का नौकरी वाला या पैसे वाला ही हो दहेज चाहे जितना देना पड़ जाए, मेरे गद्दी भाइयों यह सोच गलत है क्योंकि लालच में किया गया निकाह गलत है!मेरे गद्दी भाइयों हमारा दीन इस्लाम है और हमारे आदर्श हजरत मोहम्मद स. हैं, हमें अपने दीन और अपने आदर्श के बताए हुए रास्ते पर चलना है!हुजूर से शादी हजरत बीबी खदीजा रजि. ने इसलिए नहीं किया था कि वह कोई सरकारी हाकिम है या बहुत बड़े व्यापारी या जमींदार या किसी सियासी ओहदे पर हैं, बल्कि इसलिए किया था कि उनके अख्लाक, आदत, किरदार, व्यवहार, ईमानदारी, सादगी और सच्चाई की कोई मिसाल नहीं!मेरे नौजवान साथियों धन, दौलत, पद, प्रतिष्ठा हासिल करो मगर इसकी वजह से निकाह में विलंब ना करो और यह मिल जाने पर दहेज का लालच ना करो, तुम्हारा पद, दौलत तो लोगों को ही पसंद आएगी, लेकिन उसके साथ सादगी पसंद नेक इंसान बनो जो खुदा को पसंद आएगा!हम अपने ऑल इंडिया गद्दी समाज फेडरेशन के सभी अविवाहित नौजवान साथियों से गुजारिश करते हैं कि संकल्प लो कि हम अपनी शादी में बिल्कुल दहेज नहीं लेंगे दोस्तों अगर तुम्हीं इस पर अमल नहीं करोगे तो बिरादरी इस पर अमल कैसे करेगी, हुजूर साहब हर बात पर पहले खुद प्रैक्टिकल करते थे तब समाज के लोग मानते थे लिहाजा आप लोग इस पर अमल करने की मेहरबानी करें, दोस्तों त्याग अल्लाह को बहुत पसंद है, दहेज का त्याग करो!बिहार,उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि के संगठन से जुड़े हमारे नौजवान साथी भी इस पर अमल करें और संकल्प लें!हुजूर ने अपनी बेटी की शादी में गृहस्ती की 9 चीजे दी थी और चंद खास लोगों को दावत दी थी,वो भी मेहर के पैस से!.. इस्लाम में बारात का भी कोई जिक्र नहीं है बारात को भी बाईकाट करें.. हम तो इसे लुटेरों का गैंग कहते हैं!हम लोग हुजूर की सुन्नत पर अमल करें निकाह में अपने चंद खास रिश्तेदारों व दोस्तों को ही ले जाएं ताकि लड़की वाले पर खाना देने का दबाव खत्म हो जाए!इस्लाम के मुताबिक निकाह में लड़की पक्ष का खर्च न के बराबर है वलीमा आदि लड़के वाले को करना चाहिए!मेरे गद्दी समाज के लोगों हमें अपने दीन पर मजबूती से अमल करना चाहिए, सुन्नत व हदीस के मुताबिक ही शादी करना चाहिए!