संसद सोमवार से बोल रही थी— और तीन दिन तक लगातार बोलती रही। पर अफ़सोस यह रहा कि जब राष्ट्र को जवाब चाहिए थे, तब सरकार या तो मौन थी या फिर माइक्रोफोन पर पुरानी लकीरें पीट रही थी।

22 अप्रैल के पहलगाम हमले पर देश की सर्वोच्च विधायिका में विपक्ष ने जो सवाल उठाए, वे न केवल सरकार की नीतिगत तैयारी पर प्रश्नचिन्ह थे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और जनता की पीड़ा के बीच खोते राजनीतिक उत्तरदायित्व पर भी गहरी चोट थे। लोकसभा और राज्यसभा में सत्ता पक्ष पर विपक्ष भारी पड़ा — यह पहला दृश्य नहीं था, पर यह दृश्य अब असहज रूप ले चुका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मंगलवार को लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर भाषण दिया, तो एक युद्धकालीन प्रधानमंत्री की गंभीरता उसमें नहीं थी, बल्कि एक चुनावी सभाओं के अभ्यास की पुनरावृत्ति दिखी। देश यह देख रहा था कि इस बार न मैदान में, न मंच पर — बल्कि संसद में प्रधानमंत्री विपक्ष का सामना कर रहे थे। पर वे चूके।

विपक्ष की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस संवेदनशीलता और गंभीरता से इस विषय पर बात की, उसने राजनीतिक मर्यादा और राष्ट्रीय चिंता के बीच की वह महीन रेखा स्पष्ट कर दी, जिसे सरकार ने लांघ दिया है। प्रियंका गांधी के शब्दों में एक पीड़ित देश की माँ की पीड़ा थी, वहीं राहुल गांधी की आवाज़ में वह बेचैनी थी जो एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक नेता के भीतर उठती है जब राष्ट्र की संप्रभुता, सुरक्षा और सम्मान को टुकड़ों में बंटते देखा जाता है।

राहुल गांधी ने संसद को याद दिलाया कि अब युद्ध केवल सीमा पर नहीं होता। वह तकनीक, कूटनीति, आर्थिक दबाव और सूचना युद्ध के रूप में हमारी देहलीज़ पर दस्तक दे चुका है। उन्होंने अमेरिका के रवैये का उल्लेख करते हुए यह कड़वी सच्चाई भी कही कि भारत और पाकिस्तान को अब दुनिया एक ही पलड़े में तौलने लगी है। उन्होंने दो टूक पूछा — जब अमेरिका में जनरल असीम मुनीर को भोज पर बुलाया गया, तब भारत की पीड़ा की उपेक्षा क्यों हुई? और क्या प्रधानमंत्री में इतनी हिम्मत है कि वे ट्रम्प को संसद में झूठा कह सकें, जैसे इंदिरा गांधी ने निक्सन के समय किया था?

जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप रहे। सिर्फ चुप नहीं — उन्होंने संवाद की जगह सहज सत्य से मुंह मोड़ने वाली शैली अपनाई। 100 मिनट के भाषण में वे 14 बार नेहरू को याद कर सके, पर पहलगाम में शहीद हुए जवानों को नहीं। वे “नाभि पर वार करना है” जैसी वीर रस की पंक्तियाँ तो कह गए, लेकिन यह नहीं समझा सके कि हमला होते ही सऊदी अरब से लौटने के बाद वे सीधे कश्मीर न जाकर बिहार क्यों पहुँचे?

इस बीच सबसे मार्मिक प्रतिक्रिया शहीद शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या द्विवेदी की रही, जिन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण में पहलगाम के शहीदों की कोई चर्चा नहीं थी — उनका दर्द, उनकी पीड़ा, संसद के उस मंच से ग़ायब थी। ऐशन्या ने राहुल और प्रियंका का आभार जताया कि कम से कम उन्होंने उन्हें नाम से याद किया।

प्रियंका गांधी ने पीड़ितों के नाम पढ़ते हुए “भारतीय” कहा — सत्ता पक्ष ने हर नाम पर “हिंदू” चिल्लाया। यह संसद में आस्था की नहीं, इंसाफ की पुकार थी — जिसे सत्ता पक्ष ने धर्म की ओछी राजनीति में बदलने की कोशिश की। प्रियंका ने याद दिलाया कि भारत की आत्मा किसी धर्म की बपौती नहीं है — बल्कि उन सभी की है जो संविधान, करुणा और न्याय पर विश्वास रखते हैं।

जहाँ राहुल गांधी ने भारत की भूराजनीतिक विफलताओं को उजागर किया — चीन-पाकिस्तान-अमेरिका की त्रिकोणीय साज़िशों से भारत को अलग-थलग पड़ते दिखाया — वहीं मोदी सरकार पुरानी पैंतरेबाज़ी में उलझी रही। न अमित शाह और न मोदी — कोई भी यह बता सका कि डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा 10 मई को घोषित युद्धविराम के जवाब में भारत ने सार्वजनिक आपत्ति क्यों नहीं जताई?

सवाल सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर का नहीं है। सवाल इस देश की प्रतिष्ठा, संप्रभुता और उस नेतृत्व का है जो अब “राष्ट्रवाद” की आड़ में जवाबदेही से भाग रहा है।

तीसरे कार्यकाल की शुरुआत है — पर संसद में प्रधानमंत्री का यह पहला बड़ा भाषण कई मायनों में विफल संप्रेषण की मिसाल बना। संसद अब केवल तालियों और नारेबाज़ी का मंच नहीं रह सकती। यह एक ऐसे राष्ट्र का मंच है, जहाँ जनता की जान, जवानों का सम्मान और देश की संप्रभुता सबसे ऊपर होनी चाहिए।

समाप्ति में यही कहा जा सकता है :
जिस संसद को राष्ट्र का विवेक होना था, वहाँ सत्ता की चुप्पी और विपक्ष की पुकार के बीच अंतर साफ़ था। ऑपरेशन सिंदूर के बहाने देश को जो जवाब चाहिए थे, वे आज भी अनुत्तरित हैं। और यह केवल राजनीति नहीं — यह हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का प्रारंभिक संकेत है।

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