रिपोर्टर Jay Prakash Singh
MD News

भारत में हर आतंकी वारदात, हर विस्फोट, हर गिरफ्तार व्यक्ति के साथ एक पुराना खेल फिर से शुरू हो जाता है—संदेह, सनसनी और सुनियोजित शोर। असली सवाल गायब हो जाता है; बचे रहते हैं केवल बनावटी निष्कर्ष। यह विडंबना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। और इस बार भी अपवाद नहीं हुआ।

बीते दिनों हुई आतंकवादी घटना के बाद जिस तरह देश के अधिकांश अखबारों ने पहले पन्ने को भय और संदेह से भर दिया, वह केवल पत्रकारिता की विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विवेक की गिरावट भी है। खबरें इतनी अधिक, इतनी उलझी हुई, इतनी तेज़—कि पाठक समझ ही न सके कि असल में हुआ क्या है। यदि भ्रम फैलाना उद्देश्य न भी हो, तो परिणाम वही होता है।

लेकिन आज दो तथ्य ऐसे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

  1. पाकिस्तान और बांग्लादेश के डॉक्टरों पर ‘नज़र’: एक गहरी विसंगति

इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि करीब दो दर्जन पाकिस्तानी और कुछ बांग्लादेशी MBBS डॉक्टर भारत के अस्पतालों में काम कर रहे हैं और अब उन पर नज़र रखी जा रही है।
यह दो बुनियादी सवाल उठाती है—

(क) क्या भारत में डॉक्टरों की कमी इतनी गहरी हो चुकी है कि पाकिस्तान से डॉक्टर बुलाने पड़ें?
(ख) जब हम बांग्लादेशी घुसपैठ को चुनावी मंचों से लेकर संसद तक चिंता का विषय बताते नहीं थकते, तो बांग्लादेशी MBBS धारक भारत में कैसे रोज़गार पा रहे हैं?

खबर यह भी कहती है कि बांग्लादेश का एक MBBS डॉक्टर पहले भी आतंकी कड़ी में सामने आ चुका है, और यह भी कि पाकिस्तानी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने के नाम पर भारत में ठगी हो रही थी।

ये सभी तथ्य चिंताजनक हैं, लेकिन उतने ही विचलित करने वाले हैं जितने कि वे सवाल जिनका उत्तर सरकार और प्रणाली दोनों से गायब है।

और विडंबना यह कि ये सभी छात्र 2022 से पुराने बैचों के हैं—यानी सरकार को इस विसंगति की जरूरत तभी लगी जब राजनीतिक और समकालीन घटनाक्रम ने दबाव बनाया।

  1. आतंकी वारदात की टाइमिंग: संयोग कितना और प्रबंधन कितना?

भारतीय राजनीति में ‘हमले की टाइमिंग’ एक संवेदनशील विषय है। लेकिन संवेदनशीलता से ज्यादा विचित्र यह है कि
हर चुनाव-पूर्व या हर राजनीतिक संकट के दौरान किसी न किसी आतंकी घटना की पुनरावृत्ति होती है।

जम्मू-कश्मीर में कई गिरफ्तारियाँ, उत्तर प्रदेश में कश्मीरी डॉक्टरों की धरपकड़, दिल्ली में ब्लास्ट के आरोपियों की प्रोफाइलिंग—सब कुछ एक ही पैटर्न में फिट होता है: संदेह की राजनीति।

गंभीर प्रश्न यह है कि जब एशियन एज, अमर उजाला और कई अन्य रिपोर्टें कहती हैं कि “देशभर में बड़े हमलों की साजिश थी”, “32 कारों से चार शहर दहलाने की योजना थी”, “26 लाख जुटाए गए थे”, तो…

खुफिया एजेंसियाँ कर क्या रही थीं? अगर यह साजिश इतनी विस्तृत थी, तो सरकार को इसका पता क्यों नहीं चला? और यदि अभी पता चला है तो फिर यह स्वीकारोक्ति कि “खुफिया जानकारी नहीं थी”—क्या यह असफलता की आधिकारिक पुष्टि नहीं?

यही नहीं—
कुछ अखबार कहते हैं: दो डॉक्टरों से संपर्क की जांच की जाएगी।
दूसरे कहते हैं: दो डॉक्टर पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं।
तीसरे कहते हैं: विश्वविद्यालय अब ऑडिट के घेरे में है।

यह भ्रम सिर्फ जानकारी का नहीं, नीतिगत दिशा का है।

‘व्हाइट कॉलर टेररिज़्म’: नैरेटिव का नया हथियार

नवोदय टाइम्स से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक, “व्हाइट कॉलर टेररिज़्म” शब्द अचानक राष्ट्रीय चेतना में उछाल दिया गया। यह शब्द खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह किसी भी पढ़े-लिखे, पेशेवर, कश्मीरी—या किसी भी असहज नागरिक—को संभावित संदिग्ध में बदल देता है।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट बताती है कि कश्मीर के शिक्षित लोग बोलने से डरते हैं। क्यों? क्योंकि वे जानते हैं कि एक गलत बयान उनके सिर पर अपराध का साया डाल सकता है।

कश्मीर के अनुभवी पत्रकार मुज़फ़्फ़र रैना ने सही लिखा—
यह सिर्फ कट्टरपंथ नहीं है; यह शक्ति और अहसास की लड़ाई है। कश्मीरियों को लगता है कि उनकी संस्कृति, पहचान, जमीन और शासन सभी पर हमला हो रहा है। इस अहसास से कुछ लोग भटकते हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं।

एक या दो डॉक्टर का गुनाह 90 लाख जनता पर चस्पा नहीं किया जा सकता।

  1. अपराध रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

गृह मंत्री बयान देते हैं— “ऐसी मिसाल कायम की जाएगी कि भविष्य में कोई आतंकी वारदात न हो।” इस बयान से बड़ा सवाल खड़ा होता है: अभी तक किसने रोका था?

सिर्फ सजा की धमकी से आतंकवाद नहीं रुकता। अमेरिका ने सबको दिखा दिया कि आतंक का मुकाबला केवल दंड नहीं, संज्ञान, खुफिया सटीकता, और राजनीतिक निष्पक्षता से होता है।

भारत में समझौता ब्लास्ट हो या मालेगांव—दोषियों का सबको अंदाज़ा था, लेकिन सज़ा नहीं हुई। अगर तेवर समान होते, तो क्या आज की वारदातें होतीं?

  1. मीडिया: खबर या नैरेटिव?

सबसे शर्मनाक पक्ष यह है कि सरकार का आधा-पका तर्क, आधा-अधूरा डेटा और आधी कहानी—मीडिया पूरा करके जनता को परोस देता है। देशबन्धु को छोड़कर लगभग सभी अखबारों की लीड आज भी यही है।

द टेलीग्राफ ने स्थानीय लोगों की आवाज़ दिखाई, लेकिन देश के बाकी अखबारों में यह आवाज़ गायब है। क्यों? क्योंकि पत्रकारों के पास रिपोर्टर हैं, पर रियायत नहीं।

  1. और अंत में… राजनीति की परछाई लंबी है

एक नागरिक ने सोशल मीडिया पर लिखा: “अगर आतंकवादी वारदातें चुनाव के समय होती हैं, तो भारत में चुनाव कभी खत्म होते हैं क्या?” और “अगर चुनाव के समय आतंकी वारदातें होती हैं, तो ‘एक देश–एक चुनाव’ पर सरकार की चुप्पी क्यों?”

यह सवाल कटु हैं, पर टालने योग्य नहीं।

वास्तविकता यह है— मंदिर बनने से सत्ता मिल सकती है, लेकिन सत्ता बने रहने के लिए नए नैरेटिव चाहिए।

और जिस देश में बेरोजगारी—भूख—महंगाई—गिरती अर्थव्यवस्था जैसी चुनौतियाँ हकीकत हों, वहां “व्हाइट कॉलर टेररिज़्म” जैसे शब्द बहुत सुविधाजनक हथियार बन जाते हैं।

“जब आतंक से ज्यादा आतंक की कहानी महत्वपूर्ण हो जाए, तब समझिए—लड़ाई सुरक्षा से नहीं, नैरेटिव से लड़ी जा रही है।”

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