दुकानों पर बिकने वाले नए रुपए की माला के लिए 10 का नोट बाजार में कहां से आ रहा है दस रूपये के नोट की गड्डी Vs भ्रष्टाचार

रिपोर्टर जय प्रकाश सिंह

अलीगढ़,एक ज़माना था जब बैंक की कतार में खड़े होकर बस शादी का कार्ड दिखाओ और 10–20 रुपये के ताज़ा नोटों की एक दो गड्डियाँ आराम से मिल जाती थीं। न कोई झंझट, न कोई सिफ़ारिश। आम लोगों की छोटी-छोटी जरूरतें भी सहज पूरी हो जाया करती थीं।लेकिन आज हालात देखकर हैरानी होती है।वही गड्डियाँ जो पहले मुस्कुराकर दे दी जाती थीं, अब बड़े से बड़ा फोन घुमा लो फिर भी नहीं मिलतीं और असली दर्द यहाँ शुरू होता है 400–500 रुपये ज्यादा देने पर वही गड्डियाँ बाहर खुलेआम मिल जाती हैं। जितनी चाहिए, जितनी मांगो।मतलब साफ है—भ्रष्टाचार अब हमारी रोज़मर्रा की सबसे साधारण ज़रूरतों तक को लक्ज़री बना चुका है।शादी-ब्याह जैसे पवित्र मौकों पर भी लोग मजबूर होकर ब्लैक में पैसा लेते हैं, क्यों कि बैंक का रास्ता बंद और बाज़ार का रास्ता खुला है।सबसे बड़ा सवाल ये है ।जिस चीज़ की बैंक में कमी बताई जाती है, वही बाहर अंबार की तरह कैसे बिखरी मिलती है?ये सिर्फ संयोग नहीं बल्कि एक ऐसा अदृश्य नेक्सस है जिसके चलतेरिज़र्व बैंक से निकलने वाला नोट ज़मीन पर आते-आते सीधा ब्लैक मार्केट की गोद में पहुँच जाता है।और फिर कहा जाता है सिस्टम ठीक चल रहा है।कड़वा सच ये है किभ्रष्टाचार ने आम आदमी की जेब ही नहीं, उसकी रोज़मर्रा की गरिमा तक छीन ली है।

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