उत्तर प्रदेश पत्रकारिता प्रभारी
संवाददाता जे पी सिंह की रिपोर्ट

बहुआयामी समाचार
एम डी न्यूज़ अलीगढ

“जब सत्ता की चाकरी करने लगे कलम, तो समझ लो नागरिकता मर चुकी है। लोकतंत्र को ‘संसद के संग्रहालय’ से बाहर निकालकर सड़क पर लाने की जिम्मेदारी सिर्फ़ उस पत्रकार की है, जिसकी रीढ़ अभी बाकी है।”

लोकतंत्र की अंतिम रेखा का पतन

इस देश में आज हर संस्था पर प्रश्नचिह्न है—न्यायपालिका पर, चुनाव आयोग पर, यहाँ तक कि डेटा की विश्वसनीयता पर भी। लेकिन जब पत्रकारिता नामक वह चौथा स्तंभ गिरता है, जो इन सब पर नजर रखता है, तब लोकतंत्र केवल एक सरकारी फाइल बनकर रह जाता है।

आज, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ खबर बेची जाती है, चापलूसी खरीदी जाती है, और सत्य को सरकारी विज्ञापनों के ढेर में दफन कर दिया जाता है। लोकतंत्र को ‘उत्सव’ घोषित करने वाली सत्ता भूल गई है कि उत्सव नहीं, बल्कि सतत और निर्भीक सवाल पूछना ही लोकतंत्र का प्राण है।

पत्रकारिता कभी ‘श्रमजीवी’ (Labourer) नहीं थी, यह ‘बुद्धिजीवी’ (Intellectual) का धर्म थी। लेकिन जब सरकारें श्रम कानूनों को बदलकर पत्रकारों को बंधुआ कॉन्ट्रैक्ट पर लाने की छूट देती हैं, तो यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होता है। यह सिर्फ नौकरी की सुरक्षा नहीं है, यह सवाल पूछने की हिम्मत को ख़त्म करने की साजिश है। जिस पत्रकार को हर तीसरे महीने अपनी नौकरी जाने का डर हो, वह अदाणी, SIR या 15 लाख पर सवाल उठाने की जुर्रत कैसे करेगा?

मलाई का गणित: विज्ञापनों की बेड़ियाँ और मालिकों की मनमानी

यह मौन संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित व्यापार है।

  • सत्ता का हथियार: सरकार ने विज्ञापन को पत्रकारिता के दमन का सबसे प्रभावी हथियार बना लिया है। जिस मीडिया हाउस की फंडिंग का मुख्य स्रोत सरकारी खजाना हो, वह उस खजाने की चोरी पर सवाल कैसे उठा सकता है?
  • मालिक की मंशा: नए श्रम कानूनों में वेज बोर्ड की समाप्ति और छंटनी की आसानी ने मालिकों को खुली छूट दे दी है कि वे दबाव में काम करने वाले, कम वेतनभोगी और बहु-कार्यक्षम श्रमिक पैदा करें। पत्रकारिता की रीढ़ पर यह हमला इसलिए किया गया, ताकि पत्रकार वेतन और सुरक्षा की लड़ाई में इतना उलझा रहे कि उसके पास राष्ट्रहित की लड़ाई लड़ने का समय ही न बचे।
  • जनता को धोखा: जब देश का सारा मीडिया एक ही राग गाता है, तो जनता को यह भ्रम हो जाता है कि सब कुछ ठीक है। यह सत्य का सामूहिक बलात्कार है, जो हमें ‘विकसित भारत’ के सपनों में उलझाकर, आँकड़ों के ‘ब्लैक होल’ में धकेलता जा रहा है।

खतरे की घंटी: संस्थागत निष्ठा और लोकतांत्रिक विमर्श

आज स्थिति यह है कि जब चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, डेटा पर IMF ‘C’ रेटिंग देता है, या घोटालों की जाँचें 100 दिन में पूरी नहीं होतीं, तब पत्रकारों को ही सबसे पहले आवाज़ उठानी चाहिए। लेकिन आज पत्रकार खुद ही राजनीतिक जाँचों, मानहानि के मुकदमों और सत्ता-संरक्षित दमन का शिकार बन रहे हैं।

  • सवाल कहाँ गए? ₹15 लाख, स्विस बैंक का काला धन, नोटबंदी का लाभ, 2G-कोयला घोटालों में बरी हुए लोग, अदाणी का रहस्यमय निवेश—ये सवाल हवा में तैर रहे हैं, मगर इन्हें पकड़ने वाली “कलम मौन” है।
  • संस्थाओं का झुकाव: जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा का पुरस्कार मिलता है, और CEC की नियुक्ति प्रक्रिया बदल जाती है, तो लोकतंत्र की नींव हिलती है। पत्रकार का काम इन घटनाओं पर भयमुक्त होकर विवेचन करना है, न कि सत्ता के प्रवचन को दोहराना।

वापसी का आह्वान: रीढ़ सीधी करो!

हमारा लोकतंत्र आज अंतिम साँसें ले रहा है। यदि पत्रकारिता ने अपनी रीढ़ सीधी नहीं की, तो यह देश केवल जाति, धर्म और वोट बैंक के टुकड़ों में बंटा रहेगा, और शासन-प्रशासन की मलाई खाने का खेल बेरोकटोक चलता रहेगा।

लोकतांत्रिक पत्रकारिता को अपनी पहचान वापस पानी होगी:

  1. विज्ञापन नहीं, सदस्यता पर निर्भर हों: मीडिया मालिकों को विज्ञापनों की बेड़ियों को तोड़कर जनता के समर्थन (सब्सक्रिप्शन) पर निर्भर होना होगा।
  2. संघर्ष की एकजुटता: पत्रकारों को अपने संगठनों को पुनर्जीवित करना होगा, ताकि वे मालिकों और सरकार के खिलाफ सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई लड़ सकें।
  3. मूल मुद्दों पर वापसी: बहस को सांप्रदायिक शोर से निकालकर जीडीपी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सवालों पर वापस लाना होगा।

यह आपातकाल नहीं है, यह उससे भी बदतर है—यह अभिव्यक्ति की अनकही मृत्यु है। उस पत्रकार को सत्ता से डरना बंद करना होगा, जिसे पता है कि उसका काम झोला उठाकर चलने वाले नेताओं के पीछे ‘ज़ी-हुज़ूरी’ करना नहीं, बल्कि झोला उठाकर चल देने वाले सत्य की खोज करना है।

“याद रहे: जिस दिन पत्रकारिता केवल ‘सरकारी श्रमिक’ रह जाएगी, उस दिन भारत की पहचान एक ‘लोकतंत्र’ नहीं, बल्कि ‘नियंत्रित गणराज्य’ की होगी। यह लड़ाई सिर्फ पत्रकार की नहीं, हर नागरिक के भविष्य की है!”

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