सनातन संस्कार पाठशाला का समापन,श्रद्धा, अनुशासन एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

वाराणसी श्रीधाम वृन्दावन से काशी विश्वनाथ की पावन नगरी में श्रीराम कथा हेतु पधारे परमपूज्य भागवतकिंकर वैदिकपथिक श्री अनुराग कृष्ण शास्त्री जी के पावन सान्निध्य तथा संजय लोहिया की गरिमामयी सहभागिता में सनातन संस्कार पाठशाला का भव्य एवं उद्देश्यपूर्ण आयोजन महमूरगंज स्थित बालाजी पैलेस में दिनांक 25 से 29 दिसम्बर तक अत्यन्त श्रद्धा, अनुशासन एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस पाँच दिवसीय संस्कारात्मक शिविर में देश के विभिन्न राज्यों एवं नगरों से पधारे बालक-बालिकाओं को धनुर्विद्या, मार्शल आर्ट, इंद्रजाल, प्रज्ञोदय, न्यूमरोलॉजी, योग, ध्यान एवं जीवनोपयोगी सनातन संस्कारों का समन्वित एवं शास्त्रसम्मत प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रत्येक विषय हेतु अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ, अनुभवी एवं पारंगत प्रशिक्षकों को आमंत्रित किया गया, जिससे प्रतिभागियों को केवल ज्ञान ही नहीं, अपितु उसके व्यावहारिक एवं चरित्रगत अनुप्रयोग का भी बोध हो सके। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य वर्तमान समाज में तीव्र गति से लुप्त होती जा रही सनातन वैदिक संस्कृति, प्राचीन भारतीय विद्याओं एवं जीवनमूल्यों के संरक्षण, संवर्धन तथा भावी पीढ़ी में उनके पुनः स्थापन का रहा। यह संस्कार पाठशाला बालकों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ उनके चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, राष्ट्रबोध एवं सांस्कृतिक चेतना के जागरण का प्रभावी माध्यम बनी।
इस अवसर पर परमपूज्य श्री अनुराग कृष्ण शास्त्री जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “संस्कारविहीन शिक्षा समाज को केवल कुशल कर्मी तो दे सकती है, पर श्रेष्ठ मनुष्य नहीं। सनातन संस्कारों से युक्त शिक्षा ही राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित एवं उज्ज्वल बना सकती है।”
उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि बाल्यकाल में प्राप्त संस्कार ही जीवनभर के आचरण, दृष्टि एवं निर्णयों की दिशा निर्धारित करते हैं।
कार्यक्रम में सहभागिता कर रहे अभिभावकों एवं उपस्थित गणमान्य नागरिकों ने सनातन संस्कार पाठशाला को वर्तमान समय की एक अत्यावश्यक एवं दूरदर्शी पहल बताते हुए इसके निरंतर आयोजन एवं विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया। समग्र रूप से यह आयोजन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि यदि सनातन संस्कारों के मूल सिद्धांतों को बालकों के जीवन में पुनः प्रतिष्ठित किया जाए, तो भारत निश्चय ही पुनः विश्व को मार्गदर्शन देने वाली ‘जगद्गुरु’ परंपरा को प्राप्त कर सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed