मां से भी ज़्यादा स्नेह देती थी मेरी सास माधुरी पाठक=संध्या पाठक

मेरी दोनों बहुएं बेटी की तरह हैं, राकेश चंद्र पाठक महाकाल

वाराणसी वैसे तो दुनियां में बेटियां ससुराल में बहु, पतोह बनकर आती हैं। मायके से डोली में विदा होकर ससुराल आती हैं। अपनी मां बाप को छोड़कर विदाई के समय खूब रोती है सोचती है पराया घर कैसा होगा मेरी सास नन्द, ससुर का मेरे प्रति व्यवहार कैसा होगा। परन्तु जब सास में सास नहीं बल्कि मां की ममता की झलक, ससुर में बाप का स्नेह बहु पाती है तो बेटी बन जाती है और सास ससुर मां बाप ऐसे ही विचार एक बहु संध्या पाठक की आँखें अपनी स्व, सास माधुरी पाठक की याद में बहने लगती है। संध्या पाठक ने सिसकते हुए पत्रकारो से एक पत्रकार वार्ता के दौरान कहा। संध्या ने कहा मैने अपने सासू माँ के जिंदा करने को सोची उनके नाम से एक वट वृक्ष लगाऊं ताकी हमारे पूज्य माता हमेशा हमारे साथ रहें। हम और हमारे ससुर पापा राकेश चंद्र पाठक महाकाल ने कहा कि माधुरी पाठक हमेशा गरीबों मजलूमों की मदद करती थी इस लिए उनकी याद में माधुरी मेमोरियल चेरीटेबल ट्रस्ट रजिस्टर्ड करके न्यास की स्थापना की जाय। हम सभी घर के परिवार 10जनवरी को गरीबों को निष्काम सेवा भाव से कम्बल वितरित कर खान पान खिलाते है। संध्या पाठक ने कहा कि मेरी शादी जब मैं इंटर में पढ़ती तभी पति ललित चंद्र पाठक के साथ बहु बनकर आ गई। और ससुराल में भी सास ससुर ने बेटी से ज्यादा स्नेह दिया। मेरा मायका बहरिया बाद गाज़ीपुर मे है। 25अप्रैल 2020 में सासू मां हमे अकेली करके गोलोक चली गई। हमारा पूरा परिवार टूट गया। हम बिखर से गये लेकिन हमारे पिता तुल्य ससुर राकेश चंद्र पाठक ने स्वतः अपने को और हम लोगों को संभाला। मेरी शिक्षा स्नातक और बीटीसी है। हमने अपने सासू मां की तरह गरीबों की सेवा और समाज में दबे कुचले पीड़ित असहायों की सेवा करना है। मै आज उन बेटियों से कहना चाहूंगी कि मायके से ससुराल जाने तक के सफर में संस्कार लाए और अपने सास ससुर को मां बाप से भी ऊंचे स्थान पर रखकर पूंजे। साथ ही साथ आस पास पड़ोस को भी समेटकर रखें। आप सभी को मेरे सास ससुर की तरह परिवार मिले। मै बाबा विश्वनाथ और माता रानी से प्रार्थना करती हूं कि मैं ज़िंदगी के सफ़र में सबकी सेवा करते हुए समाज की सेवा कर सकूं यही मेरे मन की अभिलाषा है।

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