डिजिटल युग में बढ़ता एकाकीपन मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा।

डॉ. वेणु गोपाल झंवर बोले— सोशल मीडिया ने संपर्क बढ़ाया, लेकिन अपनापन घटा

वाराणसी। डिजिटल युग में जहां मोबाइल, सोशल मीडिया और वीडियो कॉल ने दुनिया को एक क्लिक पर ला दिया है, वहीं इसके समानांतर एक गंभीर मानसिक संकट भी तेजी से उभर रहा है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. वेणु गोपाल झंवर ने इसे “खामोश महामारी” बताते हुए कहा कि आज का मनुष्य दिखने व दिखाने में पहले से ज्यादा जुड़ा हुआ है, लेकिन भीतर से पहले से कहीं अधिक अकेला हो गया है। उनके अनुसार एकाकीपन अब केवल भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। डॉ. झंवर ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया की लगभग हर छठी आबादी किसी न किसी स्तर पर एकाकीपन का अनुभव कर रही है। “यह स्थिति धीरे-धीरे अवसाद, चिंता, नींद की समस्या, नशे की प्रवृत्ति और यहां तक कि आत्मघाती विचारों को जन्म देती है,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एकाकीपन का अर्थ केवल अकेले रहना नहीं है, बल्कि यह वह मानसिक पीड़ा है जिसमें व्यक्ति लोगों के बीच रहते हुए भी भावनात्मक रूप से खुद को कटा हुआ महसूस करता है। डॉ. वेणु गोपाल झंवर के अनुसार, आधुनिक शोध बताते हैं कि सामाजिक उपेक्षा या बहिष्कार से मस्तिष्क के वही हिस्से सक्रिय होते हैं, जो शारीरिक दर्द के दौरान सक्रिय होते हैं। “इसका मतलब है कि भावनात्मक दर्द भी उतना ही वास्तविक और नुकसानदेह है जितना शारीरिक दर्द,” उन्होंने कहा। उन्होंने चिंता जताई कि यह समस्या सबसे ज्यादा युवाओं में देखी जा रही है, जो सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय हैं। डॉ. वेणु गोपाल झंवर ने समाज से अपील की कि तकनीक को मानवीय रिश्तों का विकल्प न बनाया जाए। “तकनीक संपर्क का साधन हो सकती है, लेकिन संवेदना और अपनापन केवल मानवीय संवाद से ही आता है,” उन्होंने कहा। उनके अनुसार एकाकीपन को व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या के रूप में समझने और सामूहिक प्रयास से इसका समाधान खोजने की जरूरत है।

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