संवाददाता जे पी सिंह बहुआयामी समाचार एम डी न्यूज़ अलीगढ शंकराचार्य परम्परा, राज्य की अहंकार-राजनीति और लोकतंत्र की कसौटीभारतीय लोकतंत्र की एक बुनियादी विशेषता यह रही है कि वह राजसत्ता और आध्यात्मिक सत्ता के बीच एक सम्मानजनक दूरी और संतुलन बनाए रखता है। यही संतुलन इस देश की सांस्कृतिक निरंतरता और राजनीतिक स्थिरता का आधार रहा है। किंतु जब-जब राज्यसत्ता ने इस संतुलन को अहंकार, तात्कालिक राजनीति या प्रशासनिक दंभ के तहत तोड़ने का प्रयास किया है, इतिहास ने उसके परिणाम भी दर्ज किए हैं।शंकराचार्य परम्परा केवल किसी व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना की प्रतिनिधि रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठें — ज्योतिष, द्वारका, शारदा और गोवर्धन — सदियों से राजनीतिक सत्ता के समानांतर नैतिक सत्ता के रूप में मौजूद रही हैं। यही कारण है कि इन पीठों के प्रति सम्मान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत है। परम्परा बनाम प्रशासनकुंभ, माघ मेला और अन्य महापर्वों में शंकराचार्यों और अखाड़ों की भूमिका, स्नान-क्रम, पालकी, छत्र-चंवर जैसी व्यवस्थाएँ किसी शासनादेश से नहीं, बल्कि हज़ार वर्षों की स्वीकृत परम्परा से संचालित होती रही हैं। इस दीर्घ इतिहास में पहली बार 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के अवसर पर प्रयागराज में ऐसा हुआ, जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को माघी स्नान से रोका गया।घटना यहीं समाप्त नहीं होती। शंकराचार्य के दंडी संन्यासियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, पूरी रात ठंड में भूखे-प्यासे रोके जाने की सूचना और फिर उसके तुरंत बाद प्रशासनिक आक्रामकता — यह सब एक संस्थागत असहिष्णुता की ओर संकेत करता है। टकराव को चुनती सत्तासामान्यतः ऐसी घटनाओं के बाद सरकारें स्थिति को संभालने, संवाद स्थापित करने और मर्यादा बनाए रखने का प्रयास करती हैं। किंतु इस मामले में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने माफ़ी या संवाद की राह छोड़कर टकराव की राह चुनी।स्नान-विवाद के तुरंत बाद प्रयागराज मेला प्रशासन की ओर से शंकराचार्य को रातों-रात एक नोटिस जारी किया गया। नोटिस में सर्वोच्च न्यायालय का हवाला देते हुए यह प्रश्न उठाया गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती “ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य नहीं हैं”, और फिर यह पूछा गया कि वे “शंकराचार्य” शब्द का प्रयोग कैसे कर रहे हैं। 24 घंटे के भीतर उत्तर देने का निर्देश दिया गया।प्रश्न केवल नोटिस का नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग और मंशा का है। जिस प्रशासन को कल तक यह “ज्ञान” नहीं था, उसे स्नान-विवाद के तुरंत बाद अचानक यह बोध कैसे प्राप्त हुआ? और यदि यह कानूनी प्रश्न था, तो वर्षों से यह मौन क्यों बना रहा?सूत्रों के अनुसार, नोटिस चस्पा करने के लिए आश्रम में पुलिस बल के साथ अधिकारियों को भेजा गया। यह दृश्य अपने आप में बताता है कि मामला कानून का नहीं, अहंकार-प्रदर्शन का अधिक था। सत्ता का ‘इगो’ और संस्थागत संकटयोगी आदित्यनाथ की राजनीति पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वे असहमति को संवाद नहीं, संघर्ष के रूप में देखते हैं। पार्टी के भीतर, संगठन में, प्रशासन में और यहाँ तक कि सामाजिक समीकरणों में भी यह टकराव लगातार दिखाई देता है।जब यही प्रवृत्ति आध्यात्मिक संस्थाओं से टकराती है, तो सवाल केवल एक संत या एक पीठ का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि क्या राज्यसत्ता स्वयं को सर्वोच्च नैतिक प्राधिकारी मानने लगी है?“बटेंगे तो कटेंगे” जैसे नारे जिस शासन की पहचान बनें, वहाँ विभाजन केवल राजनीतिक नहीं रहता, वह सामाजिक और सांस्कृतिक भी हो जाता है। इतिहास का मौन साक्ष्यस्वतंत्र भारत में इससे पहले भी शंकराचार्यों से टकराव के प्रसंग आए हैं — 1990 में स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी, 2004 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी, 2015 में वाराणसी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर लाठीचार्ज। संयोग या इतिहास — हर बार सत्ता को उसका मूल्य चुकाना पड़ा।लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संस्थाएँ और परम्पराएँ दीर्घकालिक होती हैं। जो सरकारें इस अंतर को भूल जाती हैं, वे अक्सर तत्कालिक विजय के भ्रम में दीर्घकालिक क्षति कर बैठती हैं।अंततः प्रश्न यही है :क्या भारत का राज्य अब उन आध्यात्मिक संस्थाओं को भी प्रशासनिक आदेशों से परिभाषित करेगा, जिनकी वैधता समाज, परम्परा और इतिहास से आती है? या फिर यह टकराव आने वाले समय में सत्ता और समाज के बीच और गहरी खाई बनाएगा?इतिहास प्रतीक्षा कर रहा है — “कर्म के फल की तरह।”

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