संवाददाता जे पी सिंह बहुआयामी समाचारएम डी न्यूज़ अलीगढ मंगलवार, 19 जनवरी 2026 को भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नबीन को अपना 12वां राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया। पार्टी मुख्यालय में हुए इस औपचारिक ऐलान के साथ ही लोकतांत्रिक भाषणों और प्रतीकों की पूरी शृंखला भी सामने आई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नितिन नबीन को माला पहनाकर कहा— “मैं भाजपा का कार्यकर्ता हूं, नितिनजी मेरे बॉस हैं।” जवाब में नवनियुक्त अध्यक्ष ने इसे “एक साधारण कार्यकर्ता की असाधारण यात्रा” बताया।सुनने में यह सब ऐसा लगता है मानो दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के भीतर लोकतंत्र पूरी चमक के साथ मौजूद हो—जहां एक साधारण कार्यकर्ता भी शीर्ष तक पहुंच सकता है। एक राष्ट्रीय दैनिक ने इसे “भाजपा का नवीन युग” तक घोषित कर दिया। अलंकार की दृष्टि से यह शीर्षक भले आकर्षक हो, लेकिन सियासत में प्रश्न अलंकार से नहीं, यथार्थ से तय होते हैं। और वह यथार्थ नितिन नबीन भी जानते हैं, उनके पूर्ववर्ती जे.पी. नड्डा भी, और भाजपा का लगभग हर कार्यकर्ता भी।नितिन नबीन कोई राजनीतिक नौसिखिया नहीं हैं। बिहार में वे पांच बार के विधायक हैं और अपनी चुनावी पकड़ साबित कर चुके हैं। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में उनका प्रवेश उनके पिता, भाजपा नेता नवीन किशोर सिन्हा की आकस्मिक मृत्यु के बाद हुआ। विरासत संभालने के नाम पर पार्टी ने परिवारवाद की चिंता एक पल के लिए भी नहीं की। लगातार चुनाव जीतकर नितिन नबीन ने अपनी क्षमता सिद्ध की—इसमें संदेह नहीं। पर उसी पार्टी में, जो कांग्रेस को परिवारवाद के लिए कोसती नहीं थकती, उसी परिवारवादी पृष्ठभूमि को अनदेखा कर उन्हें पहले कार्यकारी और फिर निर्विरोध पूर्णकालिक अध्यक्ष बना दिया गया। वजह भी स्पष्ट है—वे मोदी-शाह की पसंद हैं।भाजपा में अध्यक्ष बनने की यह कोई नई प्रक्रिया नहीं है। जे.पी. नड्डा भी मोदी-शाह की पसंद थे और उनका कार्यकाल जरूरत से ज्यादा खींचकर पार्टी के शीर्ष पर बनाए रखा गया। फिर जब लगा कि अब और खींचना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, तो मोहरा बदल दिया गया। बिहार चुनाव जीतने के बाद राज्य को ‘धन्यवाद’ देने का यह भी एक तरीका हो सकता है, और युवा चेहरे के जरिए संगठन में नई ऊर्जा का भ्रम पैदा करना भी एक रणनीति। संयोग यह भी है कि भाजपा का जन्म 6 अप्रैल 1980 को हुआ और नितिन नबीन का 23 मई 1980 को—यानी पार्टी और अध्यक्ष लगभग हमउम्र हैं। लेकिन यह प्रतीकवाद भी चयन का असली कारण नहीं है। आज भाजपा में आगे बढ़ने की सबसे बड़ी योग्यता है—मोदी-शाह की पसंद होना।यहीं भाजपा और कांग्रेस के बीच फर्क साफ दिखता है। जिस कांग्रेस पर भाजपा परिवारवाद और एकाधिकार का आरोप लगाती है, वहां मल्लिकार्जुन खड़गे बाकायदा चुनाव लड़कर अध्यक्ष बने। शशि थरूर ने उन्हें चुनौती दी, असहमति दर्ज हुई, लेकिन पार्टी टूटी नहीं। कांग्रेस में आज भी अलग राय रखने वाले नेता मौजूद हैं। भाजपा में असहमति का यह स्पेस कब का खत्म हो चुका है। अटल-आडवाणी के दौर के बाद पार्टी ने कमजोर अध्यक्षों की परंपरा अपनाई—चाहे वे जना कृष्णमूर्ति हों, कुशाभाऊ ठाकरे या बंगारू लक्ष्मण। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता भी जब चुनौती बनते दिखे, तो धीरे-धीरे किनारे कर दिए गए। सवाल यह है कि नितिन नबीन इस हाशिए से कितने समय तक बचे रह पाएंगे।निस्संदेह, नितिन नबीन ने अध्यक्ष पद ऐसे समय संभाला है जब भाजपा सत्ता के शिखर पर है—240 लोकसभा सीटें, 99 राज्यसभा सदस्य, 21 राज्यों में भाजपा या एनडीए की सरकार और अधिकांश नगरीय निकायों पर कब्जा। सत्ता के आंकड़े प्रभावशाली हैं। लेकिन संगठनात्मक मजबूती केवल आंकड़ों से नहीं मापी जाती। असली कसौटी यह है कि क्या अध्यक्ष स्वतंत्र रूप से संगठन चला सकता है। प्रधानमंत्री भले ही औपचारिक रूप से उन्हें “बॉस” कहें, लेकिन क्या नितिन नबीन कभी नरेन्द्र मोदी को सलाह देने या उनके किसी फैसले पर आपत्ति जताने की स्थिति में होंगे? यही असली प्रश्न है।तात्कालिक रूप से उनके सामने केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पुड्डुचेरी के चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन सुधारने की चुनौती है। लेकिन असली परीक्षा 2029 का लोकसभा चुनाव होगा, जिसकी जीत का दावा पार्टी अभी से कर चुकी है। अमित शाह के अनुसार तब भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही होंगे—हालांकि तब उनकी उम्र 80 के पार होगी। उसी समय पार्टी में यह सवाल और तेज होगा कि मोदी के बाद कौन? संभावित संघर्ष अमित शाह बनाम योगी आदित्यनाथ का हो सकता है—एक ओर संगठन और सत्ता की पकड़, दूसरी ओर कथित जनस्वीकार्यता। इस संभावित टकराव में नितिन नबीन की भूमिका निर्णायक होगी या केवल औपचारिक—यह देखना बाकी है।संगठनात्मक क्षमता के स्तर पर नितिन नबीन ने 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में सह-प्रभारी के रूप में अपनी छाप छोड़ी थी, जहां भाजपा ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की। 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य की सभी सीटें जीतने के बाद उनका कद और बढ़ा। अब प्रश्न यह नहीं कि वे सक्षम हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या वे वास्तव में भाजपा में कोई “नवीन युग” ला पाएंगे, या फिर उसी पुराने, केंद्रीयकृत और व्यक्तिपरक सत्ता ढांचे में खुद को भी एक अस्थायी चेहरा बनाकर छोड़ देंगे।भाजपा का इतिहास बताता है कि यहां पद बदलते हैं, व्यवस्था नहीं। नितिन नबीन इस इतिहास को बदल पाएंगे या उसी का हिस्सा बन जाएंगे—यही इस “नवीन युग” की असली परीक्षा है।

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