
एम डी न्यूज़ संवाददाता जे जय प्रकाश सिंह अलीगढ की रिपोर्ट
किसी भी लोकतंत्र की असली मजबूती उसके चुनावी आँकड़ों में नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्र प्रेस में दिखाई देती है। प्रेस वह आईना है जिसमें सत्ता अपना असली चेहरा देखती है। लेकिन जब यही आईना तोड़ने की कोशिशें होने लगें, जब सच दिखाने वाले हाथ असुरक्षित हो जाएँ, तब लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है। ऐसे समय में पत्रकार सुरक्षा कानून कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ज़रूरत बन जाता है।
भारत में पत्रकारों पर हमले, धमकियाँ, झूठे मुकदमे, गिरफ़्तारियाँ और सामाजिक बहिष्कार अब अपवाद नहीं रहे। वे धीरे-धीरे सामान्य होते जा रहे हैं। ज़मीन, खनन, भ्रष्टाचार, जातीय हिंसा, महिला उत्पीड़न, सरकारी अनियमितताओं या कॉरपोरेट गठजोड़ पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे अधिक निशाने पर हैं। कई मामलों में हमलावर खुलेआम घूमते हैं और पीड़ित पत्रकार न्याय के लिए दर-दर भटकता है। यह स्थिति न केवल पत्रकारों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरनाक है।
पत्रकार सुरक्षा कानून का मूल उद्देश्य यही है कि पत्रकार डर से मुक्त होकर अपना काम कर सकें। यह कानून उन्हें धमकियों, शारीरिक हमलों, मानसिक उत्पीड़न और फर्जी मामलों से सुरक्षा देता है। जब किसी पत्रकार को यह भरोसा होगा कि राज्य उसकी सुरक्षा के लिए खड़ा है, तभी वह सत्ता से सवाल पूछने का साहस कर पाएगा।
स्वतंत्र प्रेस सत्ता को जवाबदेह बनाती है। घोटाले उजागर होते हैं, प्रशासनिक लापरवाहियाँ सामने आती हैं, और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज़ मुख्यधारा तक पहुँचती है। लेकिन अगर पत्रकार ही असुरक्षित होंगे, तो सच खुद-ब-खुद चुप हो जाएगा। इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार का सवाल है।
विडंबना यह है कि जिन देशों में लोकतंत्र मजबूत है, वहाँ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचे मौजूद हैं। भारत—जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है—वहाँ आज तक एक राष्ट्रीय स्तर का पत्रकार सुरक्षा कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने पहल ज़रूर की है, लेकिन वे न तो पर्याप्त हैं और न ही प्रभावी।
एक मजबूत पत्रकार सुरक्षा कानून
- पत्रकारों पर हमले को गंभीर अपराध माने,
- त्वरित जांच और न्याय की गारंटी दे,
- सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तरह के दबाव से सुरक्षा सुनिश्चित करे,
- और यह स्पष्ट संदेश दे कि सच बोलना अपराध नहीं है।
यह कानून सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में होगा। जो सरकार पारदर्शी और जवाबदेह है, उसे स्वतंत्र पत्रकारिता से डरने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। डर उन्हें लगता है जिन्हें सवालों से बचना होता है।
आज जब सोशल मीडिया के शोर में तथ्य और अफ़वाह के बीच की रेखा धुंधली हो रही है, तब पेशेवर पत्रकारिता और भी ज़रूरी हो गई है। लेकिन बिना सुरक्षा के पत्रकारिता संभव नहीं। कलम तभी लिखेगी, जब हाथ सुरक्षित होगा।
इसलिए अब यह सवाल टालने का नहीं है कि पत्रकार सुरक्षा कानून चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम लोकतंत्र को जीवित रखना चाहते हैं या उसे केवल औपचारिक बना देना चाहते हैं।
पत्रकार सुरक्षित होंगे,
तो सच सुरक्षित होगा।
और सच सुरक्षित होगा,
तो लोकतंत्र ज़िंदा रहेगा।
