अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई ने हाल के तनाव के दौरान अपनी छह पेट्रियट बैटरीियों को एक्टिव कर दिया है। इन बैटरीियों से 390 से ज्यादा पैक थ्री इंटरसेप्टर मिसाइलें दागी जा चुकी हैं। अब स्थिति यह बन गई है कि यूएई के पास अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है और मजबूरी में यूएई को साउथ कोरिया के इंटरसेप्टर सिस्टम का सहारा लेना पड़ा।घमंड का सिर हमेशा नीचा होता है और आज यही कहावत दुनिया की सबसे बड़ी सुपर पावर अमेरिका पर बिल्कुल फिट बैठती दिखाई दे रही है। जिस अमेरिका ने कुछ ही समय पहले दुनिया को यह बताया था कि उसके पास अनलिमिटेड मिसाइलें हैं। वही अमेरिका अब एक ऐसी समस्या में फंस गया है जिनकी उसने शायद कल्पना ही नहीं की थी। और इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब अमेरिका की नजरें भारत की तरफ उठ गई है। अमेरिका की दिग्गज रक्षा कंपनी लॉकिड मार्टिन ने भारत की दो बड़ी डिफेंस कंपनियों टाटा एडवांस सिस्टम्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से संपर्क साधा है। सबसे पहले आपको याद दिला दें कि डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका के पास अनलिमिटेड मिसाइलें हैं। लेकिन अब यह दावा धीरे-धीरे हवा होता हुआ दिखाई दे रहा है। सितंबर 2025 में अमेरिकी सेना ने लॉकिट मार्टिन के साथ एक बड़ा समझौता किया। यह समझौता करीब 9.8 बिलियन का था। इस समझौते के तहत अमेरिकी सेना को 1970 पैक थ्री इंटरसेप्ट मिसाइलें मिलने वाली थी। यह वही मिसाइलें हैं जिनका इस्तेमाल दुनिया के मशहूर पेट्रियोट मिसाइल डिफेंस सिस्टम में किया जाता है। इंटरसेप्ट मिसाइलों का काम होता है दुश्मन की बैलेस्टिक मिसाइलों और ड्रोन को हवा में नष्ट करना। लेकिन समस्या यहां से शुरू होती है। अमेरिका ने 1970 इंटरसेप्टर मिसाइलों का आर्डर तो दे दिया लेकिन अभी तक इनकी पूरी डिलीवरी नहीं हो पाई है। इसी बीच मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदलने लगे। खासकर ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई ने हाल के तनाव के दौरान अपनी छह पेट्रियट बैटरीियों को एक्टिव कर दिया है। इन बैटरीियों से 390 से ज्यादा पैक थ्री इंटरसेप्टर मिसाइलें दागी जा चुकी हैं। अब स्थिति यह बन गई है कि यूएई के पास अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलों का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है और मजबूरी में यूएई को साउथ कोरिया के इंटरसेप्टर सिस्टम का सहारा लेना पड़ायानी साफ है कि अगर सैकड़ों या हजारों ड्रोन और मिसाइलों के हमले होते हैं तो हजार 20 हजार इंटरसेप्टर मिसाइलें बहुत जल्दी खत्म हो सकती है। यहीं से अमेरिका की असली परेशानी शुरू होती है। दूसरी तरफ ईरान की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है। ईरान बेहद सस्ते लेकिन बड़ी संख्या में बनने वाले ड्रोन और मिसाइलों पर काम कर रहा है। जबकि अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलें बेहद महंगी होती है। एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लाखों डॉलर तक हो सकती है। यानी अगर दुश्मन सस्ते ड्रोन और मिसाइलों की बाढ़ ला दे तो उन्हें रोकना बेहद महंगा और मुश्किल हो जाता है और यही स्थिति आज अमेरिका के सामने खड़ी हो गई है। अब यहां एक और दिलचस्प मोड़ आता है। अमेरिकी रक्षा कंपनी लॉकिड मार्टिन इस समय उत्पादन संकट का सामना कर रही है। इंटरसेप्टर मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्हें बड़ी मात्रा में एलॉयज और कंपोजिट मटेरियल की जरूरत है और यही वजह है कि उन्होंने भारत की कंपनियों से संपर्क साधा। भारत की टाटा एडवांस सिस्टम्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड को अमेरिका ने अपनी सप्लाई चेन मजबूत करने के लिए संपर्क साधा। असल में मिसाइल बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले एयर फ्रेम तैयार किया जाता है। एयर फ्रेम बनने के बाद ही उसमें सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक और विस्फोटक सिस्टम लगाए जाते हैं। अगर एयर फ्रेम नहीं बनेंगे तो मिसाइल का उत्पादन ही रुक जाएगा और यही वह क्षेत्र है जहां भारत की कंपनियां मजबूत मानी जाती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। इस संकट के पीछे एक और बड़ा कारण है यूरोप की नीति। दरअसल हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने स्पेन को लेकर कड़ा बयान दिया था। उन्होंने स्पेन को नाटो से बाहर निकालने तक की धमकी दे दी थी। इतना ही नहीं स्पेन के साथ व्यापार बंद करने की भी बात कही गई थी। लेकिन शायद ट्रंप ने यह नहीं सोचा था कि अमेरिकी मिसाइल उद्योग में स्पेन और यूरोप के कई देशों का भी योगदान है।

ब्यूरो चीफ रामानंद सागर

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