आज हमारे समाज के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी है। बिलासपुर में किसी इबादतगाह या धर्मस्थल के करीब शराब की दुकान का खुलना सिर्फ एक कानूनी मसला नहीं, बल्कि हमारी तहजीब और अक़ीदत (आस्था) का सवाल है लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि इस बुराई के खिलाफ लड़ने वाले हमारे रहनुमा, तंजीमें और चेयरमैन पद के उम्मीदवार ‘एक मुश्त’ (एकजुट) होने के बजाय अलग-अलग गुटों में बंटकर प्रशासन को ज्ञापन दे रहे हैं। किसी भी जीवंत समाज की पहचान उसकी एकजुटता से होती है!लेकिन बिलासपुर मै धर्मस्थल के निकट शराब की दुकान के विरोध क़ो लेकर जो स्थिति बन रही है, वोह चिंताजनक है!शराब जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाना सराहनीय है लेकिन जब इस नेक मक़सद मै कौम के हित से ऊपर व्यक्तिगत वोट बैंक ओर क्रेडिट की राजनीति आ जाती है तो मक़सद अपनी ताक़त खो देता है!
साख की लड़ाई या वोट की सियासत?
जमहूरियत (लोकतंत्र) का उसूल है कि बिखरी हुई आवाज़ें नक्कारखाने में तूती की तरह होती हैं। जब हर शख्स अपना राग अपनी ढपली अलापते हुए प्रशासन को ज्ञापन’ देता है ओर (Ego) और ‘क्रेडिट’ लेने की होड़ में अलग अलग डफली बजाएगा, तो प्रशासन उसे संजीदगी से नहीं लेगा। यहाँ मसला ‘कौम और मिल्लत’ का कम और ‘वोट बैंक’ का ज्यादा नजर आ रहा है। एक-दूसरे की शक्ल न देखना और अलग-अलग टोली बनाकर घूमना हमारी कमजोरी को नुमाया (जाहिर) करता है। याद रखिए, जब हम बटे, हुए बिखरे हुए रहेंगे, तो नीति निर्धारको के लिए हमें नज़र अंदाज़ करना आसान हो जाता है,हमारी बात हुक्मरानों के कानों तक नहीं पहुंचती है! दुश्मन या बुराई कभी यह नहीं देखती कि आप किस ग्रुप से हैं बस आपकी कमज़ोरी का फायदा उठाया जाता है!इतिहास गवाह है जो क़ौम बिखरी वोह मिट गयी!
मुत्तहिद मोर्चे की ज़रूरत: हर मजहब का साझा दर्द
शराब की दुकान चाहे मस्जिद के पास हो या मंदिर के, यह हर धर्म और वर्ग के लिए एक नासूर है। यह किसी एक समुदाय का मुद्दा नहीं है। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—सभी मजहबों और वर्गों को कंधे से कंधा मिलाकर ‘शराब माफिया’ और ‘सिंडिकेट’ के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। जमहूरियत में आवाम की ताकत सबसे बड़ी होती है और किसी भी माफिया का बोलबाला जनता के अटूट इत्तेहाद (एकता) के सामने नहीं टिक सकता।
जिला प्रशासन और आबकारी नियमावली का एहतराम
हमारा मुतालबा (मांग) है कि जिला प्रशासन इस अति संवेदनशील मुद्दे पर फौरन संज्ञान ले। आबकारी नियमावली (Excise Rules) साफ़ तौर पर कहता है कि धार्मिक स्थलों और रिहाइशी इलाकों के पास ऐसी दुकानें नहीं होनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि वह बिना किसी भेदभाव के, निष्पक्ष तरीके से इन नियमों का पालन कराए। किसी भी तरह का सियासी दबाव या माफिया की साठगांठ जनभावनाओं से बड़ी नहीं हो सकती। इस सम्बन्ध मै माननीय सांसद मोहिबुल्ला नदवी साहब ने भी जिला आबकारी अधिकारी से वार्ता कर अपना विरोध ओर जनभावनाओं से अवगत करा दिया गया है,
निष्कर्ष:
वक़्त की पुकार है कि हम अपनी छोटी-छोटी दूरियों को खत्म करें। अगर आज हम सिर्फ इसलिए अलग रहे कि (सेहरा) किसके सिर बंधेगा, तो यकीन मानिए शिकस्त (हार) सबकी होगी। शराब सिंडिकेट को हराने के लिए हमें ‘हम’ बनकर लड़ना होगा, ‘मैं’ बनकर नहीं।
इत्तेहाद में ही बरकत है और इसी में जीत है।
अथर अली खां
सांसद प्रतिनिधि पूर्व सभासद
नगर पालिका परिषद बिलासपुर
रामपुर up

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