
रिपोर्ट- ओम प्रकाश साहू ।सिसेंडी, मोहनलालगंज।
मोहनलालगंज/लखनऊ: AC में अफसर, काफिले में नेता और जनता? जनता गड्ढों में गिरकर हड्डी तुड़वा रही है। ये तस्वीर है मोहनलालगंज तहसील के अंतर्गत सिसेंडी-भागूखेड़ा मार्ग की।
करीब छह किलोमीटर का ये मार्ग पूरी तरह गड्ढों में सिमट गया है। यह मार्ग गढ्ढों का श्मशान बन चुका है। स्मार्ट सिटी का तमगा लिए राजधानी को शर्मसार कर रहीं यहां की सड़कें। स्मार्ट सिटी का दावा करने वाला लखनऊ अब “गड्ढा सिटी” के नाम से ट्रेंड कर रहा है।
गड्ढों की बारात, भगवान भरोसे सफर!
राजधानी की सड़कें गड्ढों की बारात बन गई हैं। लोग गाड़ी नहीं, गड्ढा गिनते हुए सफर तय कर रहे हैं। लाखों की लागत से बनी सड़क सालभर में ही धराशायी हो गई। बारिश में सड़क तालाब बन जाती है, गड्ढा ढूंढना भी मुश्किल हो जाता है।
राहगीरों का दर्द: “साहब, रोज कमर टूटती है। ऑटो वाले किराया एक्स्ट्रा मांगते हैं — कहते हैं गड्ढों में हिचकोले खाकर मरीज बन जाओगे।” पूरे मार्ग पर कहीं भी स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था नहीं है, जिससे रात में गड्ढों को देखना नामुमकिन हो जाता है। गर्भवती महिलाएं इस मार्ग पर यात्रा करने से डरती हैं।
काफिला निकला, गड्ढे वहीं रहे
स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्रीय विधायक पिछले महीने इसी सड़क से गुजरे थे। काफिले की दस गाड़ियां हिचकोले खाकर निकल गईं। जनता को लगा अब सड़क बन जाएगी। पर हुआ क्या? विधायक जी की फॉर्च्यूनर निकल गई, जनता के गड्ढे वहीं रह गए।
“स्मार्ट सिटी” के बोर्ड तले “डैमेज सिटी” बसती है। अफसर AC में, नेता काफिले में, और जनता? जनता गड्ढे में। PWD का फुल फॉर्म लोग अब “पैसा वसूल विभाग” बता रहे हैं। क्योंकि कागजों में सड़क चकाचक, जमीन पर गड्ढे-ही-गड्ढे, डामर का नामोनिशान नहीं।
चांद का गड्ढा या लखनऊ की सड़क?
तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि ये लखनऊ की सड़क नहीं, चांद का गड्ढा है। फर्क सिर्फ इतना — चांद पर आदमी नहीं जाता, यहां रोज जाता है और हड्डी तुड़वाता है। PWD सो रहा है, कैमरा बोल रहा है।
छह किलोमीटर का ये टुकड़ा पिछले एक साल से दुर्घटनाओं का टेप बना हुआ है। गड्ढे गिनो तो गिन नहीं पाओगे। हर गड्ढा इतना गहरा कि बाइक का आधा पहिया समा जाए। इसमें कोई गिरे तो सीधा ऊपर जाएगा।
जनता की चेतावनी
PWD सुन लो — ये गड्ढा नहीं, तुम्हारे करप्शन की कब्र है। आज जनता गिर रही है, कल तुम गिरोगे। कैमरा गवाह है, जनता जज है। लोग कलावा बांधकर निकलते हैं कि “हे बजरंगबली, आज बचा लेना”। वक्त है… गड्ढा भरो, वरना कुर्सी खाली करो।
“ये सड़क नहीं, लखनऊ के विकास का पोस्टमार्टम है। और पोस्टमार्टम रिपोर्ट कर रही है- गढ्ढों की वजह भ्रष्टाचार।
