हरदोई के टंडियावां थाने में न्याय कोई सिद्धांत नहीं,एक ‘सेटिंग’बनकर रह गया था।थाना प्रभारी कुलदीप सिंह के दौर में कानून किताबों में था,और जमीन पर “जिसकी पकड़,उसकी पकड़” वाला सिस्टम चलता दिखा। 4 अप्रैल को कोटरा गांव में विश्वराज सिंह और उनके भतीजे वीरेश सिंह की पिटाई हुई—नाम आए शिवधान सिंह, धर्मेंद्र सिंह, शिवनाथ सिंह और रवि सिंह के। लेकिन कमाल देखिए—घायल इधर थे,मुकदमा उधर लिख गया। 9 अप्रैल को FIR दर्ज हुई,सेटिंग ऐसी कि पीड़ित ही आरोपी बना और दबंगों की तहरीर ‘प्राथमिकता’ बन गई।ये न्याय नहीं,खुलेआम उलटबांसी थी।

दूसरा मामला और भी सख्त सवाल खड़ा करता है। एक मां अपनी 18 साल की बेटी के अपहरण की शिकायत लेकर पहुंचती है। पुलिस लड़की को बरामद भी कर लेती है, लेकिन इसके बाद सिस्टम अचानक ‘स्लो मोशन’ में चला जाता है। पीड़िता थाने में मौजूद, मगर अदालत में बयान दर्ज कराने की जरूरी प्रक्रिया ठंडी।जैसे किसी को जल्दी ही न हो—न कानून को, न जिम्मेदारी को। यहां न्याय कोई आपातकाल नहीं, बल्कि “देखेंगे, बाद में” वाली फाइल बनकर रह गया था।

फिर एंट्री होती है पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार मीणा की और यहीं कहानी पलटती है।जैसे ही खेल खुला,कुर्सी हिली नहीं,सीधे खिसका दी गई।कुलदीप सिंह निलंबित,विभागीय जांच चालू।साफ संदेश—खाकी अगर कानून से खेलेगी,तो सिस्टम उसे खेल से बाहर कर देगा। टंडियावां की ये कहानी सिर्फ एक थाने की नहीं, पूरे तंत्र के लिए चेतावनी है,न्याय अगर बिकेगा, तो कार्रवाई बिकने नहीं देगी।

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