सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री महोदय, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ।
माननीय केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली।
जिला अधिकारी (DM) महोदय, जनपद बहराइच (उत्तर प्रदेश )।
जिला अधिकारी (DM) महोदय, जनपद बाराबंकी (उत्तर प्रदेश )।
प्रतिलिपि सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित
माननीय सांसद महोदय, कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र।
माननीय विधायक महोदय, कैसरगंज/जरवल विधानसभा क्षेत्र।
प्रमुख सचिव, लोक निर्माण विभाग (PWD), उत्तर प्रदेश शासन।
क्षेत्रीय प्रबंधक, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI)।
प्रबंध निदेशक, उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC/रोडवेज)।
विषय: बाराबंकी-बहराइच-नानपारा (NH-927) मार्ग पर जरवल (घाघरा नदी/संजय सेतु) के पास नए स्थाई पक्के सड़क पुल के निर्माण तथा संवैधानिक अधिकारों के हनन के संबंध में राजनैतिक-जनहित ज्ञापन।____________________________
महोदय,
इस ज्ञापन के माध्यम से हम ‘सर्वदलीय एवं बहुआयामी पार्टी क्षेत्रीय विकास ‘ तथा स्थानीय नागरिकों की ओर से सरकार का ध्यान देवीपाटन मंडल और नेपाल सीमा को जोड़ने वाली जीवन रेखा—घाघरा नदी पर बने जर्जर सड़क मार्ग (संजय सेतु के समानांतर व्यवस्था) की बदहाली की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं। यह ज्ञापन केवल एक मांग पत्र नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र की लाखों जनता के साथ हो रहे घोर प्रशासनिक और राजनैतिक सौतेले व्यवहार का दस्तावेजी प्रमाण है।
हम निम्नलिखित संवैधानिक, तार्किक एवं राजनैतिक तथ्यों के आधार पर तत्काल नए पक्के सड़क पुल के निर्माण की मांग करते हैं:
- रेलवे के 3 पुल बनाम सड़क का शून्य विकास (राजनैतिक विरोधाभास)
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला विरोधाभास यह है कि इसी घाघरा नदी (एल्गिन ब्रिज के पास) पर रेलवे द्वारा दो से अधिक (कुल तीन) परमानेंट और आधुनिक पुलों का निर्माण सफलता पूर्वक कर लिया गया है। जब रेलवे जैसी सरकारी संस्था भारी-भरकम ट्रेनों के लिए एक के बाद एक तीन परमानेंट पुल बना सकती है, तो देश और प्रदेश की सरकारें आम जनता, एम्बुलेंस, व्यापारियों और रोडवेज बसों के लिए एक मजबूत, स्थाई पक्का सड़क पुल क्यों नहीं बना पा रही हैं? यह क्षेत्र की जनता के साथ सीधा राजनैतिक और नीतिगत अन्याय है। - संवैधानिक अधिकारों का हनन (अनुच्छेद 19(1)(d) और अनुच्छेद 21)
• समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14): जब प्रदेश के अन्य हिस्सों में नदियों पर आधुनिक फोर-लेन और सिक्स-लेन पुलों का जाल बिछाया जा रहा है, तो इस ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग को हर साल “कछुआ/पीपा पुल” और अस्थाई मरम्मत के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाता है?
• निर्बाध आवागमन का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(d)): भारत का संविधान नागरिकों को देश में कहीं भी स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार देता है। परंतु हर साल मानसून में पुल बंद होने या तकनीकी खराबी आने से यह मार्ग ठप हो जाता है। इसके चलते 6, 8, 10 व्हीलर वाहनों और रोडवेज बसों को सैकड़ों किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है, जो जनता के इस मौलिक अधिकार का हनन है।
• जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21): गंभीर मरीजों को लेकर लखनऊ जा रही एम्बुलेंस जब इस मार्ग पर घंटो लंबे जाम या टूटे पुल के कारण फंसती है, तो सीधे तौर पर उनके जीवन के अधिकार पर प्रहार होता है। - आर्थिक और सामरिक नुकसान (राजनैतिक विफलता)
यह मार्ग (NH-927) बहराइच, कैसरगंज, जरवल रोड से होते हुए नानपारा और अंतरराष्ट्रीय नेपाल सीमा (रुपईडीहा) को जोड़ता है। टूटे पुल और अस्थाई व्यवस्था के कारण ट्रकों और वाणिज्यिक वाहनों का आवागमन ठप रहता है, जिससे स्थानीय व्यापार पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। परिवहन निगम (रोडवेज) को अत्यधिक दूरी तय करनी पड़ती है, जिसका सीधा आर्थिक बोझ जनता के टिकट और टैक्स पर पड़ता है।
मोर्चे और क्षेत्रीय जनता की मुख्य मांगें: - नए स्थाई फोर-लेन पुल की तत्काल घोषणा: जरवल रोड/घाघरा घाट पर वर्तमान जर्जर व्यवस्था के समानांतर एक नए, अत्याधुनिक और स्थाई फोर-लेन सड़क पुल के निर्माण की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति तुरंत दी जाए।
- कैसरगंज/बहराइच के जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही: स्थानीय सांसद और विधायक इस विषय पर विधानसभा और संसद में विशेष प्रस्ताव लाएं और सरकार से इस पर तुरंत बजट आवंटित करवाएं।
- कछुआ/अस्थाई पुल की व्यवस्था से मुक्ति: हर साल मरम्मत के नाम पर होने वाली खानापूर्ति और भ्रष्टाचार को बंद कर दिल्ली-मुंबई की तर्ज पर स्थाई इंजीनियरिंग समाधान लागू हो।
राजनैतिक चेतावनी:
यदि शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों (सांसद/विधायक) ने इस ज्ञापन को हल्के में लिया और इस वित्तीय वर्ष में नए पक्के सड़क पुल के निर्माण की ठोस शुरुआत नहीं हुई, तो ‘सर्वदलीय बहुआयामी पार्टी’ पूरी जनता को लामबंद करके बहराइच से लेकर बाराबंकी और लखनऊ मुख्यालय तक उग्र परंतु शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन, और चुनाव बहिष्कार जैसे कदम उठाने को विवश होगा “सड़क नहीं तो वोट नहीं, जर्जर पुल अब स्वीकार नहीं।”

