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बारिश में जंगलों की सौगात: मधुमेह में फायदेमंद है ककोरा, पेट के लिए अमृतबाण
रिपोर्टर बलराम सिंह निषाद ब्यूरो चीफ आगरा
फतेहाबाद:जैसे ही बरसात की पहली फुहारें धरती को भिगोती हैं, जंगलों में हरियाली के साथ सेहत का खजाना भी उगने लगता है। इन्हीं उपहारों में से एक है ककोरा एक जंगली सब्ज़ी जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ कई रोगों में औषधीय गुण रखती है। खासकर मधुमेह और पेट संबंधी समस्याओं में यह बेहद फायदेमंद मानी जाती है।
प्राकृतिक इलाज का स्रोत है ककोरा: ककोरा, जिसे ककोड़ा, कंटोला या भट कांटा जैसे नामों से भी जाना जाता है, एक प्रकार की जंगली सब्जी है जो सिर्फ बारिश के मौसम में ही उपलब्ध होती है। यह सब्ज़ी उत्तर भारत के जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों में खूब पाई जाती है। इसमें मौजूद कड़वे तत्व और फाइबर ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य उमेश चन्द्र वैद्य, जो पिछले 15 वर्षों से जड़ी-बूटियों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर काम कर रहे हैं, कहते हैं कि ककोरा वात, पित्त और कफ – तीनों दोषों को संतुलित करता है। मधुमेह के रोगियों के लिए यह एक प्राकृतिक औषधि है। इसके नियमित सेवन से पाचन शक्ति बढ़ती है और शरीर में इंसुलिन का प्रभाव बेहतर होता है।
उन्होंने बताया कि ककोरा की सब्जी पेट के कीड़े, गैस और कब्ज़ जैसी समस्याओं में बेहद असरदार है
पेट के लिए अमृत के समान:
आयुर्वेद के अनुसार ककोरा का स्वाद कड़वा जरूर होता है, लेकिन यही कड़वापन शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। यह एक प्राकृतिक डिटॉक्स की तरह कार्य करता है।
ग्रामीण संस्कृति में आज भी जीवित है यह परंपरा:ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग बारिश के मौसम में जंगलों से ताजा ककोरा चुनते हैं और इसे परंपरागत तरीकों से बनाकर खाते हैं। इसे हल्के मसालों के साथ या बेसन मिलाकर सब्जी के रूप में बनाया जाता है। कहीं-कहीं इसे अचार या चटनी में भी इस्तेमाल किया जाता है।
उपयोग में सावधानी जरूरी
उमेश चन्द्र वैद्य सलाह देते हैं कि ककोरा का सेवन सीमित मात्रा में और संतुलित तरीके से करना चाहिए, खासकर यदि इसे तला हुआ रूप में खाया जा रहा हो। मधुमेह के रोगियों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही इसका सेवन करना उचित रहेगा।

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