लखीमपुर खीरी, 20अगस्त 2026। रोज़गार की तलाश में घर से निकले थे। आंखों में बेहतर जिंदगी के सपने थे, परिवार की जरूरतें पूरी करने की उम्मीद थी और मन में यही भरोसा था कि मेहनत की कमाई लेकर जल्द ही अपने घर लौटेंगे। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि वापसी का यह सफर इतना दर्दनाक होगा कि घर के दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहे परिजनों को अपने अपनों की जगह उनकी अर्थियां देखनी पड़ेंगी।

लखीमपुर खीरी जनपद की मोहम्मदी तहसील क्षेत्र के गांव बेला तुलसिया में जब मध्य प्रदेश से सड़क हादसे में जान गंवाने वाले पांच श्रमिकों के शव एक साथ उनके पैतृक गांव पहुंचे तो पूरा गांव शोक में डूब गया। चारों ओर चीख-पुकार, सिसकियां और अपनों को खोने का गम था। जिस गांव में कुछ दिन पहले तक रोजमर्रा की जिंदगी और परिवारों की खुशियां थीं, वहां अचानक मातम पसरा हुआ था। बताया गया कि बेला तुलसिया गांव के कई श्रमिक धान की रोपाई के लिए मध्य प्रदेश गए थे। मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का सहारा बनने वाले इन लोगों को क्या पता था कि जिस सफर पर वे अपने घर लौट रहे हैं, वही उनका आखिरी सफर बन जाएगा। सड़क हादसे में आठ श्रमिकों की जान चली गई, जबकि 22 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हादसे की खबर गांव पहुंचते ही परिवारों में कोहराम मच गया।

जब पांच पार्थिव शरीर एक साथ उनके पैतृक गांव बेला तुलसिया पहुंचे तो यह दृश्य किसी के लिए भी देख पाना आसान नहीं था। जिन घरों में परिवार अपने लोगों के लौटने की राह देख रहे थे, वहां मातम छा गया। किसी मां ने अपना बेटा खोया, किसी पत्नी ने अपना जीवनसाथी, तो किसी मासूम बच्चे के सिर से पिता का साया उठ गया। गांव की गलियों में पसरा सन्नाटा इस दर्दनाक हादसे की कहानी खुद बयां कर रहा था। हर चेहरा गमगीन था और हर आंख में आंसू थे। एक साथ कई परिवारों पर टूटा यह दुख पूरे गांव का दुख बन गया।

इन श्रमिकों के घर लौटने का इंतजार सिर्फ उनके परिजन ही नहीं कर रहे थे, बल्कि उनके बच्चे भी कर रहे थे। किसी को पिता के हाथों से लाई गई चीजों का इंतजार था, तो किसी को उनके घर लौटने की खुशी का। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिन बच्चों ने अपने पिता के साथ भविष्य के सपने देखे थे, उन मासूमों के अरमानों पर एक पल में पानी फिर गया। परिवार की जिम्मेदारियां संभालने वाले हाथ हमेशा के लिए खामोश हो गए। यह सिर्फ पांच परिवारों का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए ऐसा जख्म है जिसकी टीस लंबे समय तक महसूस होती रहेगी।

पांचों मृतकों का अंतिम संस्कार बेहद गमगीन माहौल में किया गया। एक साथ उठती अर्थियों और एक साथ जलती चिताओं ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिन अपनों को उन्होंने रोज़गार के लिए विदा किया था, आज उन्हें अंतिम विदाई देनी पड़ रही है। गांव के लोगों की आंखों के सामने वह मंजर था, जिसे शायद वे जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे। एक साथ उठीं पांच अर्थियां मानो पूरे गांव की खुशियों को अपने साथ ले गईं।

यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि उन हजारों मेहनतकश श्रमिक परिवारों की मजबूरी की तस्वीर भी है, जो अपने घर-परिवार का पेट पालने और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर मजदूरी करते हैं। गरीबी और रोजगार की तलाश उन्हें घर से दूर ले जाती है। वे अपने परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन कई बार रास्ते में होने वाली ऐसी घटनाएं पूरे परिवार की जिंदगी बदल देती हैं। बेला तुलसिया की यह घटना भी यही सवाल छोड़ गई है कि रोज़गार की तलाश में घर से दूर जाने वाले इन मेहनतकश लोगों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने के लिए आखिर क्या किया जा रहा है?

हादसे की सूचना के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी गांव पहुंचे। उन्होंने शोकाकुल परिवारों से मुलाकात कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं और मृतकों के परिजनों तथा घायलों के परिवारों को हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। लेकिन परिवारों का दर्द इतना बड़ा है कि किसी भी सांत्वना से उसे पूरी तरह कम करना संभव नहीं। जिन घरों के कमाने वाले सदस्य चले गए, वहां आने वाले दिनों में आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ भी बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ा होगा।

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि जिन लोगों को कुछ समय पहले अपने परिवार ने रोज़गार के लिए विदा किया था, उनकी वापसी इस तरह होगी। वे कमाई करने निकले थे ताकि घर में खुशियां ला सकें, बच्चों की जरूरतें पूरी कर सकें और परिवार का भविष्य बेहतर बना सकें। मगर हादसे ने सब कुछ बदल दिया। आज बेला तुलसिया में कई घरों के दरवाजे खुले हैं, लेकिन उन्हें लौटकर आने वाला अपना कोई नहीं है। आंगन वही हैं, घर वही हैं, परिवार वही हैं—बस उन घरों की रौनक और कमाने वाले हाथ हमेशा के लिए छिन गए।
यह हादसा सिर्फ कुछ जिंदगियों के चले जाने की खबर नहीं, बल्कि कई परिवारों के सपनों के उजड़ जाने की ऐसी दर्दनाक कहानी है, जिसे बेला तुलसिया का गांव शायद कभी नहीं भूल पाएगा।

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