
विजयादशमी केवल रावण-दहन नहीं, मानव की अकर्मण्यता और कायरता पर प्रहार है – अशोक विश्वकर्मा
विजयादशमी और दशहरा पर्व पर प्रदेश उपाध्यक्ष, OBC विभाग AICC एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा अशोक कुमार विश्वकर्मा ने देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा है
कि “विजयादशमी और दशहरा का पर्व केवल रावण-दहन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव चेतना को झकझोर कर जगाने और समाज की अकर्मण्यता पर करारा प्रहार करने वाला एक विचार-उत्तेजक पर्व है।”
उन्होंने कहा, “जब श्री राम अधर्म के विरुद्ध युद्ध में उतरे, तब तत्कालीन समाज का एक भी इंसान उनके साथ युद्ध में खड़ा या लड़ा हुआ नहीं दिखता। मानव ने अपनी कायरता और तटस्थता को छिपाने के लिए श्री राम को बाद में ‘भगवान’ घोषित कर सिर-आँखों पर बैठा लिया, ताकि स्वयं अधर्म से लड़ने की जिम्मेदारी और जोखिम से बचा जा सके।”
विश्वकर्मा ने कहा, “श्री राम को रीछ, भालू और वानरों जैसी प्राकृतिक शक्तियों को संगठित कर युद्ध लड़ना और जीतना पड़ा। रावण के पास सोने की लंका का अपार धन, कुंभकर्ण जैसा बाहुबल और मेघनाद जैसा महायोद्धा था, पर धर्म का संकल्प नहीं डिगा।” उन्होंने कहा, कि *”दस सिर वाला त्रिलोक-विजेता महामायावी रावण का वध हमें सिखाता है कि असत्य और अधर्म के पक्ष में चाहे जितनी बड़ी भीड़ खड़ी हो, सत्य और धर्म के लिए नंगे पाँव लड़ने वाला संसाधन-विहीन वनवासी भी लड़कर अधर्मी को हराने में पूरी तरह सक्षम है।
अंत में उन्होंने कहा, “जब-जब मनुष्य ने कायरता त्यागकर सत्य और धर्म के पथ पर कदम बढ़ाया है, विजय सदैव उसी की हुई है। दशहरा हर साल इसीलिए मनाया जाता है ताकि मानव मस्तिष्क से अधर्म के विशाल वैभव का डर निकले।”
