हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं से लेकर सरकारी प्रचार अभियानों तक, हर कदम पर गहन विश्लेषण की आवश्यकता महसूस होती है। यह सिर्फ एक पार्टी या सरकार का मामला नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारी जड़ों पर विचार करने का विषय है।
RTI: एक सशक्त हथियार या राजनीतिक हथियार?
सूचना का अधिकार (RTI) कानून, जिसे कभी पारदर्शिता का प्रतीक माना जाता था, आज सवालों के घेरे में है। यह दावा कि आरटीआई कानून लाने वाले “भ्रष्ट” थे और अब “ईमानदारी” का दौर है, एक गहरी विरोधाभासी स्थिति को दर्शाता है। यदि ईमानदारी ही सर्वोपरि है, तो क्या हमें आरटीआई को और मजबूत नहीं करना चाहिए, बजाय इसके कि उसे कमजोर किया जाए या उसके महत्व को कम आंका जाए? आरटीआई का मूल उद्देश्य नागरिकों को सरकार के कामकाज की जानकारी देना है, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। यदि इस कानून को ही राजनीतिकरण का माध्यम बना दिया जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका होगा।
विदेशी दौरे और प्रचार की कीमत:
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को लेकर उठने वाले सवाल स्वाभाविक हैं। पत्रकारों को साथ न ले जाना और इसके बजाय “मित्रों” या प्रचार के उद्देश्य से लोगों को शामिल करना, पारदर्शिता पर संदेह पैदा करता है। यह दावा कि विदेशों में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता प्रचारित करने पर “अच्छा-खासा खर्च” होता है, चिंताजनक है। सार्वजनिक धन का उपयोग व्यक्तिगत या पार्टी के प्रचार के लिए करना, भले ही वह देश की छवि सुधारने के नाम पर हो, उचित नहीं ठहराया जा सकता। “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे अभियानों के लिए सांसदों को विदेश भेजना, यह भी दर्शाता है कि प्रचार को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है, शायद विकास और शासन से भी ऊपर।
जवाबदेही बनाम “मन की बात”:
एक लोकतांत्रिक सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने कार्यों के लिए जवाबदेह होगी। हालांकि, वर्तमान संदर्भ में यह शिकायत आम हो गई है कि सरकार “जवाब तो नहीं ही देती है मन की बात ही करती है”। अपने प्रचार में “देश का पैसा लुटाना” और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना, एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है। जब सत्ता अपने कार्यों पर सवाल उठाने वालों को दरकिनार करती है और केवल अपनी उपलब्धियों का बखान करती है, तो यह जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
विपक्ष की भूमिका और जनता की अपेक्षाएं:
विपक्ष की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। जब शशि थरूर जैसे विपक्षी नेता भी “मौका लपकने” से नहीं चूकते, तो यह जनता में निराशा पैदा करता है। विपक्ष की कमजोर और अवसरवादी भूमिका सत्ता को और निरंकुश होने का अवसर देती है। वहीं, आम नागरिक (या बहुमत) की आकांक्षाएं भी जटिल हैं। यदि जनता केवल “हिंदुत्व का भला होता रहे”, “प्रचार मिलता रहे” और “प्रधानमंत्री को छू लेने का सपना पूरा हो जाये” जैसी भावनाओं से प्रेरित है, तो यह गंभीर चिंतन का विषय है। यह दर्शाता है कि वैचारिक बहस और तार्किक विश्लेषण की जगह भावनात्मक अपील ने ले ली है।
कांग्रेस के विरोध का आधार अभी भी इमरजेंसी जैसे पुराने मुद्दों पर होना, यह भी दर्शाता है कि विपक्ष नए और प्रासंगिक मुद्दों पर जनता को कितना कम प्रभावित कर पा रहा है। 2014 के बाद पद्म पुरस्कार पाने वाले कितने लोगों ने इमरजेंसी पर किताबें लिखी हैं, यह सवाल एक दिलचस्प विडंबना प्रस्तुत करता है कि कैसे इतिहास को वर्तमान राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति में आज पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक धन के सदुपयोग को लेकर एक गंभीर बहस की आवश्यकता है। केवल नारों और प्रचार के माध्यम से एक मजबूत लोकतंत्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहां सरकार जनता के प्रति जवाबदेह हो, जहां सार्वजनिक धन का उपयोग जनता के कल्याण के लिए हो, और जहां राजनीतिक दल वास्तविक मुद्दों पर सार्थक बहस करें, न कि केवल भावनात्मक अपील पर निर्भर रहें। क्या हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ केवल प्रचार ही सत्य है, या हम पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों पर फिर से जोर देंगे? यह प्रश्न हम सभी के लिए विचारणीय है।

रिपोर्ट शिवम कुमार गुप्ता
