“जहाँ शासक मतदाताओं को चुनने लगे, वहाँ प्रजा नहीं, प्रपंच होता है।”
भारत का लोकतंत्र अपने ही भार से डगमगाने लगा है। जिस मतदाता की अंगुली की स्याही सत्ता को वैधता देती है, आज वही मतदाता सूचियों से नदारद है — न केवल सरकारी आंकड़ों में, बल्कि लोकतांत्रिक आत्मा से भी। चुनाव आयोग की “स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न” प्रक्रिया में पहला ही चरण ऐसा विस्फोट लेकर आया है कि पूरे लोकतंत्र की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है: 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हो गए हैं।
यह कोई मामूली संख्या नहीं है। यह वह जनसमूह है जो एक संसदीय क्षेत्र के नहीं, एक पूरे राज्य के निर्णय को प्रभावित कर सकता था। आयोग कहता है — 22 लाख लोग मृत पाए गए, 7 लाख के दोहरे पंजीकरण थे, 35 लाख स्थायी रूप से विस्थापित हो चुके हैं और 1.2 लाख ने फॉर्म ही नहीं भरा। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में नागरिकता और मताधिकार को साबित करने की ज़िम्मेदारी राज्य की है या नागरिक की? और अगर फॉर्म भरने से तय होगी नागरिकता, तो संविधान की धारा 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का क्या होगा?
■ मतदाता नहीं, लोकतंत्र बाहर हुआ है
भारत में एक गहरी विडंबना यह है कि लोकतंत्र की भागीदारी में गरीब, ग्रामीण, वंचित, दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग सर्वाधिक सक्रिय होता है — वही वर्ग जो अक्सर राज्य और समाज दोनों से बहिष्कृत होता है। लेकिन इस बार उसी वर्ग को मतदाता सूची से वंचित किया जा रहा है। यह कोई संयोग नहीं हो सकता।
सवाल यह भी है कि अगर 2024 के आम चुनावों में यही सूची मान्य थी, और अब उसमें 65 लाख ‘अवैध’ मतदाता निकाले गए हैं, तो क्या हम मान लें कि पिछली सरकारें फर्जी वोटों के दम पर बनीं? या अब यह सूची सत्तावर्ग की इच्छा के अनुसार “शुद्धिकरण” का शिकार है?
■ सूफी परंपरा और संत साहित्य का लोकतांत्रिक स्पर्श
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया कहा करते थे — “राजा की प्रजा ही उसका हक़ तय करती है, वरना वह ग़ासिब होता है।” यही भाव तुलसीदास भी ‘रामराज्य’ में रखते हैं जहाँ राज सिंहासन पर वही बैठता है जो प्रजा के दुख को अपना माने। लेकिन आज की राजनीतिक संस्कृति न राजा को जवाबदेह बनाना चाहती है और न प्रजा को सम्मान देना।
मतदाता सूची से वंचित नागरिक वह है, जो वोट डालने आता है, नारे नहीं लगाता; जो कैमरे के लिए अंगुली नहीं दिखाता, बल्कि चुपचाप लाइन में खड़ा रहता है। उसकी नागरिकता अब एक ‘फॉर्म’ पर निर्भर हो गई है। यह लोकतंत्र की हत्या नहीं, बल्कि उसका चुपचाप गला घोंटना है।
■ क्या यह डिजिटल जनगणना की तैयारी है?
क्या यह पूरी कवायद 2029 की उस तैयारी का हिस्सा है, जिसमें आबादी और मतदाता संख्या के अनुपात को पुनः परिभाषित किया जाएगा? उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत के अधिक पढ़े-लिखे, जागरूक और स्थिर मतदाता पहले ही इस प्रक्रिया को लेकर चिंतित हैं। कहीं यह सूचीबद्ध “डिल्यूज़न” (वोटर पतन) जनगणना आधारित प्रतिनिधित्व प्रणाली की नई राजनीतिक स्क्रिप्ट तो नहीं?
■ लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्न
वोटर सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को तकनीकी या प्रक्रियागत बताना लोकतंत्र का अपमान है। यह वही मानसिकता है जो संविधान को ‘काग़ज़ की किताब’ और नागरिकता को ‘फॉर्म नंबर 6’ बना देना चाहती है।
आज यदि भगवद्गीता के कृष्ण होते, तो अर्जुन से यही कहते — “जो शासक अपने ही प्रजाजनों को लोकतंत्र से निष्कासित करता है, वह न तो धर्म का रक्षक है और न ही सत्ता का अधिकारी।”
■ समाप्ति नहीं, शुरुआत की पुकार
यह सम्पादकीय केवल शिकायत नहीं है — यह चेतावनी है।
यदि लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखना है, तो हमें वोटर को सूची में नहीं, व्यवस्था के केंद्र में रखना होगा। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब “लोकतंत्र” केवल एक इलेक्शन कमिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध ‘PDF’ बन कर रह जाएगा — अपलोडेड, डाउनलोडेड और डिलीटेड।
