सेवा’ और ‘त्याग’ की गाथा!

‎हम उम्मीद करते हैं कि आप सभी, अपने सपरिवार सहित, इस पवित्र पत्रकारिता के यज्ञ में सकुशल आहुति दे रहे होंगे।

‎साथियों, आपको याद होगा, विगत दिनों महराजगंज जनपद के निचलौल थाना क्षेत्र के बरोहिया चौराहे पर क्या हुआ था। हमारे निडर साथी, धर्मेंद्र कसौधन, जब किसानों के हक़ की खाद को मुनाफे के अंधे कारोबार में नेपाल भेजने की ‘पवित्र सेवा’ का कवरेज करने पहुँचे, तो उन्हें खाद व्यवसायी अनिल सिंह और उनके पूरे परिवार द्वारा बीच सड़क पर बर्बरतापूर्वक सम्मानित किया गया था। इस घटना से पूरे पत्रकारिता जगत में गंभीर रोष की लहर दौड़ गई थी।

‎आपके एकजुट सहयोग और दबाव का ही परिणाम था कि अपराधी के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज हुआ, और मुख्य आरोपी अनिल सिंह, दो दिन के लिए ही सही, जेल की यात्रा कर आए। और हाँ, अब वह मान-सम्मान के साथ जमानत पर बाहर हैं यह सब आपके एकजुट प्रयास का ही फल है!

‎ ‘मैनेजमेंट गुरु’: सेमरा ढाला के ‘माननीय’ शेख साहब!*

‎लेकिन साथियों, इस पूरी कथा का सबसे रोचक और शिक्षाप्रद अध्याय अब आता है। इस पूरे न्याय के संघर्ष को ‘मैनेज’ करने के लिए, हमारे ही बीच के एक परम हितैषी पत्रकार साथी, सेमरा ढाला निवासी ‘माननीय’ शेख साहब, अपने पूरे दम-खम, बल, और पराक्रम के साथ, अपराधी अनिल सिंह के दाहिने हाथ बनकर खड़े हो गए।

‎जी हाँ! यह वही शेख साहब हैं, जिन्होंने इस घटना के हर नए मोड़ पर, सिर्फ एक ही पवित्र उद्देश्य के लिए अपना सर्वोच्च त्याग किया—कि आरोपी को किसी तरह ‘छोड़’ दिया जाए! मैं उनके इन घृणित और सेवा-भाव वाले कार्यों को नज़रअंदाज़ करता रहा, लेकिन जब आला अधिकारियों ने कहना शुरू कर दिया कि: “अरे! आपके ही बीच का एक पत्रकार आपके विरोध में पैरवी कर रहा है, हम पर दबाव बना रहा है कि मुकदमे को कमज़ोर कर दें!” तब मेरे सब्र का बाँध टूट गया।

सोनवल का ‘स्वर्ण-युग’ और शेख साहब का ‘सामाजिक कार्य‘!*

‎साथियों, यह वही ‘मान्यवर’ हैं, जिनके सामाजिक कार्यों का एक और उज्ज्वल अध्याय आज से एक वर्ष पूर्व सिंदुरिया थाना अन्तर्गत सोनवल ग्राम सभा में लिखा गया था।

‎याद है? जहाँ ग्रामीणों ने रात के अंधेरे में उनकी (और उनके चार अन्य साथियों की) ज़ोरदार पिटाई की थी? जहाँ वे किसी तरह अपनी जान बचाकर भागे थे? और जहाँ ग्राम प्रधान ने सिंदुरिया थाने में तहरीर दी थी कि ये लोग (जिनमें माननीय शेख साहब भी शामिल थे) ‘लड़की लाकर हमारे पंचायत भवन में अय्याशी कर रहे थे!’?

‎घटनास्थल पर जो मोटरसाइकिल मिली थी, उसकी डिग्गी में कथित तौर पर ‘समाज-सेवा’ के कुछ गुप्त उपकरण यानी कंडोम भी पाए गए थे! यानी, सच्चाई को दरकिनार कर, उन्हें मनगढ़ंत मामला बनाकर जेल भेजने की तैयारी हो गई थी।

पत्रकारिता का ‘मसीहा’ और ‘मान्यवर’ की जमानत!

‎मुझे जब इसकी जानकारी मिली, तो मैंने सबसे पहले अपने पत्रकार साथी के हित को देखा। मैंने अपने व्यक्तिगत अच्छे संबंधों को भी दरकिनार करते हुए, सोनवल के प्रधान से माँफी मंगवाई और मामले को रफ़ा-दफ़ा करवाया। मैंने, एक सच्चे पत्रकार के तौर पर, अपने साथी को गंदगी से बाहर निकाला।

‎लेकिन, आज वही ‘माननीय शेख साहब’, उसी ‘परम-पवित्र’ पत्रकारिता के नाम पर, अपराधी के लिए पैरवी कर रहे हैं!

‎*वाह! क्या ग़ज़ब का ‘किरदार’ है!*


ऐसे ‘पवित्र आत्माओं’ से, जो पीछे से छुरा घोंपने और सामने से झूठे समर्थन का नाटक करते हैं, हम सभी को अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता है।
सावधान साथियों! अपने बीच के ऐसे ‘मैनेजमेंट गुरुओं’ को पहचानें, जिनकी निष्ठा पत्रकारिता के प्रति नहीं, बल्कि अपराध और समझौते के प्रति है!

हेमंत कुमार दूबे(अध्यक्ष-पत्रकार एकता संघ महराजगंज)


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