उत्तर प्रदेश पत्रकारिता प्रभारी जय प्रकाश सिंह की रिपोर्ट
बहुआयमी समाचार
एम डी न्यूज़ अलीगढ
भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा माहौल खड़ा किया जा रहा है कि मतदाता सूची = नागरिकता। यह न सिर्फ़ विधिक रूप से गलत, संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य, नैतिक रूप से आपत्तिजनक, और सामाजिक रूप से खतरनाक है— बल्कि लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
- विधिक दृष्टिकोण: कानून साफ़ है, डर फैलाने वाले गलत हैं
Represention of the People Act, 1950–51 के अनुसार:
- चुनाव आयोग को सिर्फ़ मतदाता सूची अपडेट करने का अधिकार है।
- नागरिकता तय करने का अधिकार Citizenship Act, 1955 के तहत केवल केंद्र सरकार के पास है।
इसलिए SIR प्रक्रिया को इस रूप में प्रस्तुत करना कि— “नाम नहीं हुआ तो नागरिकता खत्म”
यह कानूनी जालसाजी से कम नहीं। मतदाता सूची में नाम न होना = नागरिकता समाप्त हो जाना पूरी तरह झूठ है। वोटर लिस्ट का कटना नागरिकता पर कोई प्रभाव नहीं डालता।
यह दावा करना कि SDM → DM → CEO की प्रक्रिया “नागरिकता परीक्षण” है, कानूनी अज्ञान भी है और राजनीतिक चाल भी।
- संवैधानिक दृष्टिकोण: लोकतंत्र की रीढ़ पर कुल्हाड़ी
संविधान का “अनुच्छेद 326” कहता है— मताधिकार निवास और आयु पर निर्भर है, नागरिकता परीक्षण पर नहीं। और अनुच्छेद 5–11 नागरिकता को पूरी तरह एक स्वतंत्र विषय मानते हैं।
SIR मॉडल इन दोनों सिद्धांतों को काटता है:
- मताधिकार को नागरिकता से जोड़ता है,
- और नागरिकता का परीक्षण चुनावी तंत्र के हवाले करता है,
जो संविधान ने कभी अनुमति नहीं दी। यह सीधे-सीधे संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण है।
- नैतिक दृष्टिकोण: शासन नागरिक को डराकर अधीन बनाना चाहता है
SIR मॉडल अपने मूल में एक नैतिक अपराध जैसा है।
सरकार और प्रशासन नागरिकों को बता रहे हैं: “फॉर्म नहीं भरा तो पहचान खो दोगे।” यह भाषा लोकतंत्र की नहीं, नियंत्रित प्रजा तंत्र (authoritarian governance) की है।
जब सरकारी नोटिस, BLO, अधिकारी, वेबसाइट, गाइडलाइन; सब मिलकर एक ही संदेश दें— “डरो, भागो, फॉर्म भरो, वरना भुगतो” तो यह नागरिक प्रबंधन नहीं, Citizen harassment है।
नैतिकता कहती है— राज्य नागरिक की सेवा करे, न कि नागरिक राज्य का डर।
- सामाजिक दृष्टिकोण: यह सामाजिक विभाजन और शंका का हथियार है
- बुज़ुर्ग के पास 2002 का रिकॉर्ड नहीं
- प्रवासी मजदूर के पास पता प्रमाण नहीं
- किरायेदार के पास स्थायी दस्तावेज़ नहीं
- गरीब के पास डिजिटल सुविधा नहीं
- वेबसाइट कभी चलती है, कभी बंद
इस पूरे तंत्र का लक्ष्य स्पष्ट दिखता है— कमज़ोर, गरीब, हाशिए के लोगों को फँसाना और डराना। SIR मॉडल एक ऐसी सामाजिक मशीन बन रहा है जिसमें—
- दस्तावेज़वान नागरिक = सुरक्षित
- दस्तावेज़विहीन नागरिक = संदिग्ध
और यह विभाजन भारत की सामाजिक संरचना के खिलाफ है।
- वास्तविक सवाल—SIR क्यों बनाया गया है?
यदि SIR का लक्ष्य
- मतदाता सूची का “शुद्धीकरण”
- या दोहरे नाम हटाना
होता…
तो प्रक्रिया सरल होती।
लेकिन यह अत्यधिक जटिल, बहु-स्तरीय और दंडात्मक क्यों है?
- SDM
- DM
- CEO (प्रदेश)
एक साधारण मतदाता के लिए यह प्रक्रिया नहीं, सज़ा है।
ऐसा लगता है जैसे राज्य कह रहा हो— “पहले खुद को साबित करो, तब हम तुम्हें नागरिक मानेंगे।” यह लोकतंत्र नहीं, नागरिकता को संदेह के कटघरे में खड़ा करना है।
- SIR समर्थकों के दावों का खंडन
दावा: SIR से नागरिकता तय होगी
सत्य: चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार ही नहीं।
दावा: नाम नहीं रहेगा तो आप नागरिक नहीं रहेंगे
सत्य: मतदाता सूची नागरिकता का प्रमाण नहीं, केवल आयु/निवास का रिकॉर्ड है।
दावा: यह अनिवार्य राष्ट्रीय सत्यापन प्रक्रिया है
सत्य: यह एक राज्य-स्तरीय प्रशासनिक अभ्यास है,
जिसे “नागरिकता परीक्षण” बताना जनता को भ्रमित करना है।
दावा: जो फॉर्म नहीं भरेगा, वह संदिग्ध नागरिक
सत्य: यह दावा असंवैधानिक, अनैतिक और सामाजिक रूप से खतरनाक है।
लोकतंत्र में नागरिकता साबित नहीं की जाती, मान ली जाती है
SIR मॉडल आज एक खतरनाक संदेश दे रहा है: “पहचान रहेगी तभी अधिकार मिलेंगे।” लेकिन भारतीय संविधान कहता है: “अधिकार जन्मसिद्ध हैं, राज्य से भी बड़े।”
SIR को नागरिकता से जोड़ने की यह प्रवृत्ति एक खतरनाक मिसाल स्थापित कर सकती है— जहाँ नागरिक फॉर्म, प्रमाणपत्र, आफ़िसरों और अपीलों की भूल-भुलैया में अपनी पहचान खो देगा। यह लोकतंत्र की नहीं, नागरिकता को संदिग्ध बनाने की राजनीति है और इसका प्रतिरोध ही भारत के भविष्य का प्रतिरोध है।

