वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी व वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला की बहस से गुंडा एक्ट की कार्यवाही निरस्त, हाईकोर्ट की नज़ीर बनी आधार

वाराणसी | विधि संवाददाता

गुंडा नियंत्रण अधिनियम के तहत की गई कार्यवाही को लेकर चल रहे एक महत्वपूर्ण प्रकरण में कानून की सूक्ष्म व्याख्या और सशक्त अधिवक्ता–बहस का प्रभावी उदाहरण सामने आया है। वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला द्वारा की गई विस्तृत, तथ्यपरक एवं विधि–सम्मत बहस के उपरांत अपर पुलिस आयुक्त (कानून-व्यवस्था), कमिश्नरेट वाराणसी ने गुंडा एक्ट के अंतर्गत जारी नोटिस को निरस्त कर दिया।
बहस के दौरान यह प्रमुख रूप से रेखांकित किया गया कि मात्र दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को “गुंडा” की श्रेणी में रखना न तो अधिनियम की मंशा के अनुरूप है और न ही संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपने तर्कों में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की प्रचलित न्यायिक नज़ीरों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गुंडा नियंत्रण अधिनियम का प्रयोग विधिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता। आदेश में विशेष रूप से Govardhan बनाम राज्य से संबंधित उच्च न्यायालय के निर्णय का संदर्भ लेते हुए कहा गया कि केवल सीमित मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध गुंडा एक्ट की कार्यवाही जारी रखना न्यायोचित नहीं है। अपर पुलिस आयुक्त ने यह भी पाया कि अधिनियम की धारा 2(ख) तथा धारा 3 के आवश्यक तत्व इस प्रकरण में पूर्ण नहीं होते। विधि विशेषज्ञों का मत है कि यह आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विधिक प्रक्रिया और निष्पक्ष प्रशासन के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करता है। साथ ही, यह निर्णय प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है कि गुंडा एक्ट जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग केवल ठोस, निरंतर एवं गंभीर आपराधिक गतिविधियों के स्पष्ट आधार पर ही किया जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी एवं आशुतोष शुक्ला की प्रभावशाली बहस को इस निर्णय की निर्णायक कड़ी माना जा रहा है।

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