रामानंदाचार्य की भक्ति व्यक्तिगत मोक्ष से समाज सुधार तक का सफर

समरसता की परंपरा जाति भेद मिटाकर शिष्यों में एकता का संदेश

726वें जन्मोत्सव पर काशी प्रयागराज में एक साथ प्रदीप्त हुई भक्ति की ज्योति

राष्ट्र निर्माण में रामानंद परंपरा की प्रासंगिकता आज के लिए प्रेरणा

वाराणसी। प्राचीन श्रीराम मन्दिर गुरुधाम, काशी में आयोजित एक विशेष सभा में श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी ने जगद्गुरु रामानंदाचार्य के राष्ट्रहितकारी समर्पण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रामानंदाचार्य ने भक्ति को केवल आत्मिक उद्धार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज सुधार, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्र-चेतना का माध्यम बनाया। उस युग में जब संस्कृत भाषा शास्त्रों तक सिमटी हुई थी, उन्होंने लोकभाषा को धर्म का अवाहन बनाकर जन-जन तक रामतत्त्व पहुंचाया। यह भाषा से ऊपर उठकर भारतीय सांस्कृतिक लोकतंत्र का प्रथम साहसिक घोष था। राम उनके लिए केवल आराध्य नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय और करुणा के जीवंत आदर्श थे, जिन पर सुदृढ़ राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है। रामानंदाचार्य की भक्ति ने समरसता का रूप धारण किया। जाति, कुल और सामाजिक भेद उनके लिए अर्थहीन थे। उन्होंने कबीर, रैदास, धन्ना, पिपा जैसे 12 प्रमुख शिष्यों (जिनमें विभिन्न जातियों और पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे) को शिष्य बनाकर यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊँचाई जन्म से नहीं, बल्कि चरित्र और चेतना से मापी जाती है।
हरि को भजे जो हरि का होई इस सूत्र ने भारतीय समाज को जोड़ने वाली मजबूत सेतु का काम किया। उनका वैराग्य लोक-विमुख नहीं था, बल्कि करुणा से ओतप्रोत लोकमंगल की साधना थी, जिसने उत्तर भारत में वैष्णव चेतना की गहरी जड़ें जमाईं और संकट काल में भी भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखा। प्रयागराज (जन्मस्थान) में जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य के 726वें जन्मोत्सव के अवसर पर काशी की पावन भूमि में भी यह उत्सव एक साथ मनाया गया। सभा में जगतगुरु रामकमलाचार्य, महंत श्रवण दास, महंत मोहन दास, महंत सिया राम दास सहित वैष्णव विरक्त संत समाज ने श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी का उद्बोधन सुनकर उन्हें सम्मानित किया। यह एक दिवसीय आयोजन दोनों आध्यात्मिक नगरों में एक साथ प्रदीप्त होने वाली ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो बुंदेलखंड सहित समूचे उत्तर भारत के स्वर्णिम इतिहास को गढ़ रहा है। यह कार्यक्रम समरसता और एकता के उनके संदेश को आज के संदर्भ में जीवंत करता है।
श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी ने कहा कि रामानंदाचार्य का उद्घोष आज भी प्रासंगिक है। उनकी परंपरा ने भक्ति को सामाजिक समरसता का माध्यम बनाया, जो आधुनिक भारत में भी जाति-भेद, भाषाई विभाजन और सामाजिक असमानता को मिटाने का सूत्र है। तीर्थ, नगर और ग्राम उनके उपदेशों से अनुप्राणित हुए, और आज जब राष्ट्र एकता की मजबूत नींव पर खड़ा हो रहा है, तब उनकी शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची भक्ति राष्ट्र-निर्माण और लोकमंगल से जुड़ी होती है। यह सभा भारतीय चेतना के उज्ज्वल दीप की तरह राष्ट्र-प्रांगण को आलोकित करती रहेगी।

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