धर्मेन्द्र कसौधन/ब्यूरो
लखनऊ। प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टलने के बीच राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायती राज विभाग के उस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है, जिसके तहत मौजूदा ग्राम प्रधान ही अब ‘प्रशासक’ के तौर पर गांवों की सरकार चलाएंगे। उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह व्यवस्था पहली बार लागू होने जा रही है, जिससे चुनावों में देरी के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे।
क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?
दरअसल, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट न होने के कारण राज्य में पंचायत चुनाव समय पर नहीं कराए जा सके। हालांकि अब ओबीसी आयोग का गठन किया जा चुका है, लेकिन चुनावी तैयारियों को पूरा करने में अभी कम से कम 6 महीने का समय लग सकता है। चूंकि 26 मई को वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, इसलिए सरकार ने बीच की इस अवधि में विकास कार्यों को गति देने के लिए यह वैकल्पिक रास्ता चुना है।

कैसे काम करेगी नई व्यवस्था?
प्रधान ही होंगे प्रशासक: कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी प्रधानों के अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, बल्कि वे प्रशासक की भूमिका में आ जाएंगे।
समिति का होगा गठन: विकास कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन प्रशासकों के नेतृत्व में एक विशेष समिति बनाई जाएगी।
नए कार्यों को मंजूरी: इस नई व्यवस्था के तहत न केवल पहले से चल रहे विकास कार्य जारी रहेंगे, बल्कि जरूरत के अनुसार गांवों में नए प्रोजेक्ट भी शुरू किए जा सकेंगे।
पहले की व्यवस्था से कितना अलग है यह फैसला?
उत्तर प्रदेश में इससे पहले जब भी पंचायत चुनाव टलते थे, तब शासन द्वारा गांवों में तैनात एडीओ पंचायत (ADO Panchayat) या सचिव (सेक्रेटरी) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। ऐसा होने पर ग्राम प्रधानों के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार समाप्त हो जाते थे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बार मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तर्ज पर यह बड़ा बदलाव किया है, जहां पहले से ही ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाने की व्यवस्था रही है। यूपी के इतिहास में यह पहली बार है जब जनप्रतिनिधियों पर भरोसा जताते हुए उन्हें चुनाव होने तक यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
