​मद्रास हाई कोर्ट ने एक दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में साफ कर दिया है कि केवल धर्म परिवर्तन (मतांतरण) करने से किसी व्यक्ति को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। अदालत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति इस्लाम अपनाता है, तो वह केवल मुस्लिम बनता है; उसे स्वतः ही किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

​तमिलनाडु सरकार का आदेश असंवैधानिक घोषित

​न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामिनाथन और न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी की पीठ ने 25 जून को यह फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें धर्म बदलने वालों को ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ (BCM) के रूप में मान्यता देने का प्रावधान था। कोर्ट ने सरकार के इस कदम को असंवैधानिक और संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताया।

​क्या था पूरा मामला?

​यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था, लेकिन बाद में उसने इस्लाम अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया।

  • ​उसने खुद को ‘मुस्लिम लेब्बाई’ समुदाय का सदस्य बताते हुए पिछड़ा वर्ग (BC) प्रमाण पत्र की मांग की थी।
  • ​स्थानीय तहसीलदार द्वारा आवेदन खारिज होने के बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया।
  • ​याचिकाकर्ता ने राहत के लिए तमिलनाडु सरकार के 2024 के उस शासनादेश (GO) का हवाला दिया था, जिसके तहत अनुसूचित जाति (SC), ओबीसी (OBC) या एमबीसी (MBC) से इस्लाम अपनाने वालों को भी मुस्लिम पिछड़े वर्ग में शामिल करने की बात कही गई थी।

​कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

  • आरक्षण का आधार जाति या धर्म नहीं: अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण का मुख्य आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है, न कि केवल धर्म।
  • 1951 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला: हाई कोर्ट ने अपने ही 1951 के पुराने फैसले (जी. माइकल बनाम वेंकेटेश्वरन) का जिक्र करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह सिर्फ एक मुस्लिम बनता है। इस्लाम में आने के बाद उसकी पिछली जाति का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, इसलिए वह किसी जाति-विशेष के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

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