बहुआयामी पार्टी के माध्यम से उत्तर प्रदेश के तराई और भारत-नेपाल सीमा पर निवास करने वाली लाखों की आबादी की ओर से एक अत्यंत गंभीर प्रशासनिक विफलता और जन-उपेक्षा की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं। आज जब देश 5G टेक्नोलॉजी और शत-प्रतिशत डिजिटल गवर्नेंस का दावा कर रहा है, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती और जंगल लाइनों से जुड़े सैकड़ों गांव आज भी ‘पाषाण काल’ (No Network Zone) की अंधेरी दुनिया में जीने को मजबूर हैं।
यह ज्ञापन केवल एक सुविधा की मांग नहीं है, बल्कि यह सरकार की उन नीतियों पर सवालिया निशान है जो कागज पर तो ‘डिजिटल’ हैं, लेकिन धरातल पर घोर असमानता को जनम दे रही हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु और डेटा-आधारित जमीनी हकीकत:

  1. डिजिटल नीतियों की विफलता और ‘राशन-बैंकिंग’ से वंचित गरीब जनता:
    सरकार की लगभग 100% योजनाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं। PhonePe, Google Pay और UPI के इस दौर में तराई के इन गांवों में एक रुपये का डिजिटल लेन-देन असंभव है। सबसे संवेदनशील बात यह है कि सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS/राशन कोटा) पूरी तरह बायोमेट्रिक और ई-पॉस (e-POS) मशीनों पर निर्भर है। नेटवर्क न होने के कारण सैकड़ों राशन की दुकानों पर अंगूठे का मिलान (Biometric Verification) नहीं हो पाता, जिससे गरीब परिवारों को हफ्तों तक अपने हक के अनाज के लिए भटकना पड़ता है। पीएम-किसान सम्मान निधि की ई-केवाईसी (e-KYC) और छात्रों की स्कॉलरशिप का फॉर्म भरने के लिए युवाओं को 20 से 30 किलोमीटर दूर कस्बों की दौड़ लगानी पड़ती है।
  2. नेपाल बॉर्डर सिक्योरिटी और सामरिक सुरक्षा (National Security) पर चोट:
    लखीमपुर खीरी, बहराइच और पीलीभीत का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय भारत-नेपाल सीमा से सटा हुआ है। इस संवेदनशील और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाके में मोबाइल नेटवर्क का न होना सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ है। सीमावर्ती गांवों में नेटवर्क न होने के कारण स्थानीय नागरिक किसी भी संदिग्ध गतिविधि, तस्करी या घुसपैठ की सूचना समय पर एसएसबी (SSB) या स्थानीय पुलिस को नहीं दे पाते। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिहाज से यह एक गंभीर और अक्षम्य सुरक्षा चूक है।
  3. प्रमुख टाउन क्षेत्रों और विकासखंडों में बैंकिंग सेवाओं का पूर्णतः ठप होना:
    तराई क्षेत्र के प्रमुख कस्बों, व्यापारिक केंद्रों और विकासखंडों (ब्लॉकों) जैसे लखीमपुर खीरी की धनगढ़ी व गौरीफंटा लाइन, बहराइच के मिहिपुरवा व रुपीडीहा तथा पीलीभीत के कई सीमावर्ती व्यापारिक क्षेत्रों में सरकार और आरबीआई (RBI) के निर्देश पर कई सरकारी व गैर-सरकारी बैंक शाखाएं तो खोल दी गई हैं, लेकिन कनेक्टिविटी न होने से ये सफेद हाथी साबित हो रही हैं।
    • ‘सर्वर डाउन’ का परमानेंट बहाना: जब स्थानीय ग्रामीण, किसान और छोटे व्यापारी इन बैंकों में पैसा निकालने, जमा करने या पासबुक प्रिंट कराने जाते हैं, तो बैंक अधिकारियों का एक ही रटा-रटाया जवाब होता है— “इंटरनेट नहीं चल रहा है, सर्वर डाउन है, आज काम नहीं हो पाएगा, कल या परसों आना।”
    • आर्थिक और समय की भारी बर्बादी: बैंक अधिकारियों द्वारा इंटरनेट कनेक्टिविटी का हवाला देकर जनता को महीनों दौड़ाया जाता है। इससे दूर-दराज के गांवों से किराया लगाकर आने वाले गरीब ग्रामीणों का न सिर्फ पूरा दिन और पैसा बर्बाद होता है, बल्कि समय पर इलाज, शादी-ब्याह या खेती के लिए अपनी ही गाढ़ी कमाई का पैसा मिलना असंभव हो जाता है। यह वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के दावों की घोर विफलता है।
  4. वन्यजीव अभ्यारण्य (Sanctuaries) और रेलवे लाइन क्षेत्रों की घोर उपेक्षा:
    पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PHTR), दुधवा नेशनल पार्क (Lakhimpur Kheri), और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य (Bahraich) के बफर जोन तथा इनसे गुजरने वाली रेलवे लाइनों के किनारे बसे गांवों की स्थिति भयावह है। इन क्षेत्रों में नेटवर्क न होने के कारण:
    • मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict): बाघ या तेंदुए के हमले या हाथियों द्वारा फसल नष्ट किए जाने पर ग्रामीण वन विभाग या एम्बुलेंस को कॉल तक नहीं कर पाते। सहायता पहुंचने से पहले ही जानें चली जाती हैं।
    • रेलवे दुर्घटनाएं: इन वन क्षेत्रों से गुजरने वाली रेलवे लाइनों पर कोई हादसा या तकनीकी खराबी होने पर तत्काल आपातकालीन संचार स्थापित करने का कोई जरिया नहीं है।
  5. निजी टेलीकॉम कंपनियों (Jio, Airtel, Vi) का कॉर्पोरेट भेदभाव:
    यह साफ है कि Jio, Airtel और Vodafone जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां केवल वहीं निवेश करती हैं जहां उन्हें भारी बिजनेस और मुनाफा दिखता है। तराई के गरीब और कम आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में कम मुनाफे के कारण इन कंपनियों ने जानबूझकर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। यह समानता के अधिकार (Article 14) का खुला उल्लंघन है। एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को डिजिटल अधिकार इस आधार पर नहीं दिए जा सकते कि वे कॉर्पोरेट कंपनियों को कितना व्यापार दे रहे हैं।
  6. यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) का दुरुपयोग:
    सरकार देश के प्रत्येक नागरिक से मोबाइल बिल और रिचार्ज पर यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) के रूप में टैक्स वसूलती है। इस फंड का मुख्य उद्देश्य ही पिछड़े, ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में दूरसंचार अवसंरचना (Mobile Towers) का विकास करना है। तराई के सैकड़ों गांवों का अंधकार में रहना यह साबित करता है कि इस फंड का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है।

बहुआयामी पार्टी की मुख्य और त्वरित मांगें:

  1. विशेष टास्क फोर्स का गठन: दूरसंचार मंत्रालय और राज्य सरकार मिलकर पीलीभीत, लखीमपुर और बहराइच के वन व सीमावर्ती क्षेत्रों के ‘नो-नेटवर्क’ गांवों का एक संयुक्त सर्वे कर 6 महीने के भीतर ‘डार्क विलेजेस’ की सूची सार्वजनिक करे।
  2. लीज-लाइन और बैंकों के लिए विशेष प्रबंध: मिहिपुरवा, रुपीडीहा, धनगढ़ी, गौरीफंटा सहित सभी सीमावर्ती कस्बों के बैंकों को बीएसएनएल (BSNL) या अन्य माध्यमों से हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर लीज-लाइन अनिवार्य रूप से दी जाए ताकि ‘सर्वर डाउन’ के नाम पर जनता का उत्पीड़न बंद हो।
  3. USOF फंड से टावरों की स्थापना: Universal Service Obligation Fund (USOF) के तहत विशेष बजटीय प्रावधान कर दुधवा, कतर्नियाघाट और पीलीभीत सेंचुरी के बफर जोन में पर्यावरण नियमों का पालन करते हुए तत्काल मोबाइल टावर खड़े किए जाएं。
  4. कॉर्पोरेट कंपनियों पर अनिवार्य बाध्यता: ट्राई (TRAI) और सरकार निजी ऑपरेटरों (Jio/Airtel) के लिए ‘रोल-आउट ऑब्लिगेशन’ (Roll-out Obligations) कड़ा करे, जिससे उन्हें अपने कुल टावरों का एक निश्चित हिस्सा इन सीमावर्ती और पिछड़े क्षेत्रों में लगाना ही पड़े।
  5. अंतरिम सैटेलाइट वाई-फाई: जब तक स्थाई मोबाइल टावर नहीं लग जाते, तब तक इन सैकड़ों गांवों की ग्राम पंचायतों, बैंकों और राशन कोटे की दुकानों पर ‘सैटेलाइट आधारित इसरो (ISRO) वीसैट (VSAT) इंटरनेट इंटरनेट हॉटस्पॉट’ स्थापित किया जाए ताकि राशन और बैंकिंग जैसी आवश्यक सेवाएं न रुकें।
5 views

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed