ब्यूरो चीफ रफीउल्लाह खान की रिपोर्ट

सियासत में इख़्तिलाफ़ हो सकते हैं, लेकिन जब इल्म, तालीम और हज़ारों नौजवानों के मुस्तक़बिल पर ख़तरा मंडरा रहा हो, तब बड़े किरदार वही होते हैं जो अपने निजी मतभेदों से ऊपर उठकर समाज के हित में खड़े हों।
रामपुर की अवाम द्वारा चुने गए सांसद मौलाना मुहीबुल्ला नदवी ने यही वसीअ-ज़र्फ़ी (बड़ी सोच) दिखाई। तमाम सियासी मतभेदों को पीछे छोड़कर वे जोहर यूनिवर्सिटी पहुँचे, ताकि छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों से मुलाक़ात कर उनका हौसला अफ़ज़ाई करें और इस तालीमी इदारे को बचाने की मुहिम में अपना समर्थन दर्ज करा सकें।
अफ़सोस अगर ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी सियासी तास्सुब (पूर्वाग्रह) तंग नज़री और निजी नाराज़गियों को तालीम पर तरजीह दी जाए, तो इससे सबसे ज़्यादा नुकसान उन छात्रों को होता है जिनका भविष्य इस इदारे से जुड़ा है।
इसके बावजूद मौलाना मुहीबुल्ला नदवी ने सब्र, तहम्मुल और सियासी परिपक्वता का परिचय दिया। उन्होंने यूनिवर्सिटी के गेट पर ही प्रेस वार्ता कर ऐलान किया कि जोहर यूनिवर्सिटी की हिफ़ाज़त की लड़ाई किसी एक शख़्स की नहीं, बल्कि इल्म, तालीम और आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल की लड़ाई है, और इस मक़सद के लिए हर लोकतांत्रिक कोशिश जारी रहेगी।
तारीख़ गवाह है कि अहंकार, तकब्बुर और ज़ाती मुख़ालिफ्त में डूबे लोग वक़्त की गर्द में गुम हो गए, लेकिन वसीअ-ज़र्फ़ी, दरियादिली और बड़ी सोच रखने वाले लोगों को इतिहास हमेशा इज़्ज़त और एहतराम के साथ याद रखता है।
दरवाज़े बंद किए जा सकते हैं, लेकिन नेक नीयत, तालीम की हिमायत और अवाम की आवाज़ को कभी क़ैद नहीं किया जा सकता। आखिरकार फ़तह हमेशा इल्म, इंसाफ़ और बड़े दिल वालों की होती है।
