
प्रो. आभा मिश्रा पाठक एवं डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव की पुस्तक ‘सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी’ का लोकार्पण
बीएचयू महिला महाविद्यालय में सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ, काशी की सांस्कृतिक विरासत पर हुआ मंथन
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में मंगलवार को ‘सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से काशी’ विषय पर सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला की संरक्षिका महिला महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रीता सिंह तथा संयोजिका प्रो. आभा मिश्रा पाठक हैं। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी रहे, जबकि बीज वक्तव्य प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने दिया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. रीता सिंह ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। प्रो. आभा मिश्रा पाठक ने विषय की स्थापना करते हुए काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में काशी की बहुआयामी सांस्कृतिक पहचान तथा उसके संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार राजन श्रीवास्तव की भी उपस्थिति रही।
वक्ताओं ने कहा कि काशी केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, आध्यात्मिकता, कला, संगीत और परंपराओं की जीवंत धरोहर है। सदियों से काशी की पहचान उसके घाटों, मंदिरों, स्थापत्य, लोकजीवन, कला, संगीत और विविध सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी रही है। ऐसे में काशी की विरासत को संरक्षित करते हुए उसे सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
पुस्तक ‘सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी’ का लोकार्पण
कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में प्रो. आभा मिश्रा पाठक एवं डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी’ का लोकार्पण भी किया गया। पुस्तक में पर्यटन की दृष्टि से काशी के मंदिरों, घाटों, पर्व-उत्सवों, लोक-संस्कृति, कला, संगीत, स्थापत्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों का विस्तृत विवेचन किया गया है।
पुस्तक की लेखिका प्रो. आभा मिश्रा पाठक एवं डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव ने कहा कि काशी की पहचान को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं है। इसकी व्यापक सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन की संभावनाओं को समग्रता में समझने की आवश्यकता है। काशी की सांस्कृतिक विविधता को पर्यटन से जोड़कर इसके संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
राष्ट्रीय कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विषय विशेषज्ञों ने काशी की सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया। सात दिनों तक चलने वाली कार्यशाला में काशी की सांस्कृतिक परंपराओं, विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं पर विस्तृत मंथन किया जाएगा। पुस्तक का लोकार्पण काशी के अकादमिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जगत के लिए महत्वपूर्ण अवसर रहा।
![]()
